Srishti Khanda Extracted Page 426

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-426

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Sanskrit Original

पुलस्त्य उवाच अहं ते कथायिष्यामि सर्वमेतदशेषत: । यच्छुत्वा नपुनर्मोह यास्यते नृपसत्तम ॥२॥ येन जायेत प्रेतत्वं येन चास्मात्प्रमुच्यते। प्राप्रोति नरकं घोरं दुस्तरं त्रिदशैरपि॥३॥ सतां संभाषणे चैव पुण्यतीर्थानुकीर्ततने । मानवास्तु प्रमुच्यते आपन्नाः प्रेतयोनिषु ॥४॥ श्रूयते हि पुरा भीष्म ब्राह्मणः संशितव्रतः । पृथुस्सर्वत्रविख्यातः संतोषे च सदा स्थितः ॥५॥ स्वाध्याययुक्तो गेहेषु नित्ययोगश्च योगवित् । जपयज्ञविधानेन युक्तं कालं क्षिपेच्च सः ॥६॥ युक्तः क्षमा दयाभ्यां च क्षांत्या युक्तश्च तत्त्ववित्। अहिंसा हितचितश्च मार्दवे च तथा स्थितः ॥७॥ ब्रह्मचर्यसमायुक्त स्तपो योगसमन्वितः । युक्तः स पितृकार्येषु युक्तो वैदिककर्मसु ॥८॥ परलोकभये युक्तो युक्तस्सत्यवचः प्रति। युक्तो मधुरवाक्येषु युक्तश्चातिथिपूजने ॥९॥ इष्टापूर्तसमायुक्तो युक्तो . इंद्वविवर्जने । स्वकर्मविधिसंयुक्तो युक्तः स्वाध्यायकर्मसु ॥१०॥ एवं कर्माणि कुर्वतस्संसारविजिगीषया । बहून्यब्दानतीतानि ब्राह्मणस्य गृहे सतः ॥९९॥ तस्य बुद्धिरियं जाता तीर्थाभिगमनं प्रति । पुण्यैस्तीर्थजलै रेतत्क्लिन्नं कुर्या कलेवरम् ॥१ २॥ प्रयतः पुष्करे स्नात्वा भास्करस्योदयं प्रति । कृतजप्यनस्कारोप्यदध्वानं प्रत्यपद्यत ॥१३॥ अग्रतः पंचपुरुषानपश्यत सोतिभीषणान् । वने कंटकवृक्षाढ्ये निर्जने पक्षिवर्जिते॥१४॥ तान् दृष्ट्वा विकृताकारान् सुघोरान् पापदर्शनान् । ईषत्संत्रस्तहृदयो व्यातिष्ठन्निश्चलाकृतिः ॥ १ ५॥। अवलंब्य ततो घैर्य्य॑ भयमुत्सृज्य दूरतः । पप्रच्छ मधुराभाषी के यूयं विकृताः कुतः ॥१६॥ मुक्त हो सकता है ? इसे आप मुझे बतलायें ॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- मैं तुम्हें इन सारी बातों को बतला रहा हूँ । उसको सुनकर हे राजवर्य आपको पुनः मोह नहीं होगा ॥२॥ जिस कर्म को करने से मनुष्य प्रेत होता है, और जिस कर्म को करने से उसको प्रेतत्व से मुक्ति मिलती है अथवा किस कर्म के फल स्वरूप देवताओं को भी भयङ्कर नारकीय यातना भोगनी पड़ती है ॥३॥ सज्जनों के साथ संभाषण (सत्सङ्ग) तथा पावित्र तीर्थ का नाम कीर्तन करने से मनुष्य प्रेतयोनि से छुटकार प्राप्त करते हैं ॥४। हे भीष्म ! यह सुना जाता है कि पूर्वकाल में प्रशंसित व्रतों को करने वाले पृथु नाम के ब्राह्मण थे । वे सदा संतोष रखने वाले विख्यात ब्राह्मण थे ॥५॥ वे अपने घर में ही रहकर स्वाध्याय करते थे, वे योगवेत्ता तथा योग करते रहते थे । वे सदा जपयज्ञ में लगे रहकर अपना समय बिताते थे ॥६॥ वे तत्त्ववेत्ता क्षमा तथा दया से युक्त थे । हमेशा अहिंसा का पालन करते थे तथा स्वभाव से मृदु थे ॥७॥ ब्रह्मचर्यं का पालन करने वाले सदा तपस्यारत रहते थे । वे पितृकार्यो तथा वैदिक कार्यो को करने में ही संलग्न रहते थे ॥८॥ उनको परलोक से भय था तथा सदा वे सत्य बोलते थे । वे मधुर बोलते थे तथा अतिथियों का पूजन करते रहते थे ॥९॥ वे इष्टापूर्त (वावली कूप इत्यादि का निर्माण कराना) करते रहते थे तथा सुख दुःख आदि द्वन्द से रहित थे । वे अपने विहित कार्मा को तथा स्वध्याय कर्म को करते रहते थे ॥१५०॥ संसार पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से वे इसी प्रकार से कर्मों को करते रहते थे । इस तरह उस ब्राह्मण के अपने घर में रहते हुए अनेक वर्ष बीत गये ॥११॥ उसके बाद उनकी इच्छा तीर्थाटन करने की हुयी । वे सोचे कि तीर्थो के पवित्र जलों से अपने शरीर को में पवित्र बना लूँ ।।१२॥ नियमपूर्वक पुष्कर में स्नान करके भगवान् सूर्य के उदित हो जाने पर जप तथा नमस्कार करके जब वे मार्ग में आये ॥१३॥ उसी समय उन्होंने अत्यन्त भयङ्कर पाँच पुरुषों को अपने सामने देखा । वे पुरुष काण्टों वाले घने वृक्षों से भरे हुए तथा पक्षियों से रहित निर्जन वन में विद्यमान थे ॥१४॥ विकृत आकार वाले,

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