Srishti Khanda Extracted Page 425
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-425
Sanskrit Original
तेषां त्वं वरदा देवि भव सर्वगता सती । इमं पर्वतमारूहा यः पूजयति भक्तित:॥१४५॥ स पुत्र पौत्रपशुमान् समृद्धिमुपगच्छतु । यश्चैवंशृणुयाद्धक्त्या स्तवं देवि समुद्धवम्॥९४६॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छतु। भ्रष्टराज्यो यदा राजा नवम्यां नियतः शुचिः॥९४७॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां सोपवासो नरोत्तम । संवत्सरेण लभतां राज्यं निष्कंटकं पुनः ॥१४८॥ एषा ज्ञानान्विता शक्तिः शिवदूतीति चोच्यते। य एवं श्रृणुयान्नित्यं भक्तया परमया नृप ॥१४९॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमाध्नुयात् । यश्चैनं पठते भक्तद्या स्नात्वा वै पुष्करे जले॥१५०॥ सर्वमेतत् फलं प्राप्य ब्रह्मलोके महीयते। यत्रैतल्िलिखितं गेहे सदा तिष्ठति पार्थिव ॥१५९॥ न तत्राञ्रिभयं घोरं सर्वचोरादिसंभवम्। यश्चेदं पूजयेद्धक्तया पुस्तकेपि स्थितं बुधः ॥१५२॥ तेन चेष्टं भवेत् सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम् । जायंते बहवः पुत्राः धनं धान्यं वरस्त्रियः ॥१५३॥ रत्नान्यश्वागजा भृत्यास्तेषामाशु भवंति च । यत्रेदं लिख्यते गेहे तत्राप्येवं ध्रुवं भवेत् ॥ १ ५४॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे शिवदूतीचरितं नाम एकत्रिंशोऽध्यायः ॥३ १॥ Ae बतीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच केन कर्मविपाकेन प्रेतत्वं जायते पुनः केन वात्र प्रमुच्येत तन्मे ब्रूहि महामते॥१॥ प्रदान करें । जो व्यक्ति इस पर्वत पर चढकर भक्तिपूर्वक आपकी पूजा करे ॥१४५॥ वह पुत्रों पौत्रों तथा पशुओं की समृद्धि से युक्त हो जाय । हे देवि ! जो व्यक्ति इस स्तोत्र को भक्तिपूर्वक सुने और आपकी उत्पत्ति की कथा को सुने॥१४६॥ वह सभी पापों से मुक्त होकर मुक्ति प्राप्त कर ले । जिसका राज्य भ्रष्ट हो गया हो ऐसा राजा पवित्र होकर यदि अष्टमी तथा चतुर्दशी को ब्रत करे वह उत्तम पुरुष एक वर्ष में अपना पुन: राज्य प्राप्त कर ले ॥१४८॥ ज्ञान से युक्त यह शक्ति शिवदूती कहलाती है । हे राजन् ! जो व्यक्ति परमाभक्ति के साथ इस कथा को सुने ॥१४९॥ वह सभी पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर ले, जो व्यक्ति पुष्कर के जल में स्नान करके इस कथा का भक्तिपूर्वक श्रवण करे ॥१५०॥ वह इन समस्त फलों को प्राप्त करके ब्रह्मलोक में पूजित होता है । हे राजन् ! जिस घर में यह स्तोत्र लिखित रूप से रहता है ॥१५१॥ उस घर में चोर तथा अग्नि आदि का भय नहीं रहता है । जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक पुस्तक में भी विद्यमान इस स्तोत्र की पूजा करता है ॥१५२॥ उसके लिए यह चणाचरात्मक त्रैलोक्य प्रिय हो जाय । उसके यहाँ अनेक पुत्र, धन, धान्य तथा श्रेष्ठ खिियाँ हों ॥१५३॥ उन लोगों को शीघ्र ही अनेक प्रकार के रत्न, घोड़े, हाथी तथा नौकर प्राप्त हो जाते हैं । जहाँ पर यह स्तोत्र लिखित रूप से रहता है, वहाँ भी ये सारी चीजें प्राप्त रहती हैं ॥१५४॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के शिवदूतीचरित वर्णन नामक इकतीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ३९।। —— ke प्रेतपंचक की कथा, अन्तरिक्ष स्थित पुष्कर के पृथिवी पर आने का वृत्तान्त वर्णन, कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर में स्नानादि का माहात्म्य, सरस्वती के पाँच स्रोतें का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- जीव किस कर्म के फल स्वरूप प्रेत होता है और किस कर्म को करके वह प्रेतयोनि से
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