Srishti Khanda Extracted Page 424
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-424
Sanskrit Original
उपहारे नरा ये तु करिष्यंति च कौमुदीम् । चणकान्पूरिकाश्चैव वृषणैः सह पूपकान् ॥१३२॥ बंधुभिः स्वजनैश्चैव तेषां वंशो न छिद्यते। अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् ॥१३३॥ रूपवान् सुभगो भोगी सर्वशास्त्रविशारदः । हंसयुक्तेन यानेन ब्रह्मलोके महीयते॥१३४॥ शिवदूति मयाप्येवं तासां दत्तं च भक्षणम् । त्रपाकरं किं भवत्या उक्तोहं तन्निशामय ॥१३५॥ जयस्व देवि चामुंडे जयभूतापहारिणी। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तुते ॥१३६॥ विश्वमूर्तियुते शुद्धे विरूपाक्षि त्रिलोचने। भीमरूपे शिवे विद्यो महामाये महोदरे ॥१३७॥ मनोजये मनोदुर्गे भीमाक्षि क्षुभितक्षये। महामारिविचित्रांगि गीतनृत्यप्रिये शुभे ॥१३८॥ विकरालि महाकालि कालिके पापहारिणि । पाशहस्ते दंडहस्ते भीमहस्ते भयानके॥१३९॥ चामुंडे ज्वलमानास्ये तीक्ष्णदंष्टे महाबले । शिवयानप्रिये देवि प्रेतासनगते शिवे ॥१४०॥ भीमाक्षि भीषणे देवि सर्वभूतभयंकरि । करालि विकराले च महाकालि करालिनि॥१४९॥ कालि करालविक्रांते कालरात्रि नमोस्तुते । सर्वशस्त्रभृते देवि नमो देवनमस्कृते ॥१४२॥ एवं स्तुता शिवदूती रुद्रेण परमेष्ठिना । तुतोष परमा देवी वाक्यं चैवमुवाच ह ॥१४३॥ वरं वृणीष्व देवेश यत्ते मनसि वर्तते । रुद्र उवाच स्तोत्रेणानेन ये देवि स्तोष्यंति त्वां वरानने ॥१४४॥ चाहिए । आपलोग भी मातृकाओं के नाम से लोक में प्रसिद्ध होंगी ॥१३१॥ जो लोग उपहार के रूप में आपलोगों को प्रकाश, चने से बने भोजन, पूड़ी तथा पूजा प्रदान करेंगे ॥१३२॥ वे अपने बांधवों तथा स्वजनों से सम्पन्न होंगे। उनकी सन्तानों का कभी उच्छेद नहीं होगा । इससे पुत्रहीन पुत्र को तथा धनार्थी धन को प्राप्त कर लेता है ॥१३३॥ वे लोग रूपवान, सुभग, तथा भोग सम्पन्न तथा सभी शास्त्रों में निपुण रहकर मृत्यु के बाद हंसयुक्त विमान के द्वारा ब्रह्मलोक में जायेंगे ॥१३४॥ हे शिवदूती ! मैंने इन सबों को इस प्रकार का भोजन प्रदान किया है । मैंने लज्जाकारक जो कहा है उस को आप देखें ॥१३५॥ हे चामुण्डे देवि ! आपकी जय हो, हे भूतों का अपहरण करने वाली देवि आपकी जय हो । हे सर्वव्यापिके देवि आपकी जय हो, हे कालरात्रि देवि आपको नमस्कार है ॥१३६॥ हे विश्वमूर्ति से युक्ते, हे शुद्धे, हे विरूपाक्षि, त्रिलोचने भयङ्कर रूप वाली, शिवे, कल्याणकारिणि, हे विद्या स्वरूपिणी, हे महामाये, हे महोदरे, आपकी जय हो ॥१३७॥ हे मनोजये, हे मनोदुर्गे, हे भीमाक्षि, हे क्षुभितक्षये ! हे महामारि! हे विचित्रांगि ! हे गीत नृत्य प्रिये ! हे शुभे ।॥१३८॥ हे विकराल आकारों वाली, हे महाकाली ! हे कालिके ! हे पापहारिणि (पापों को विनष्ट करने वाली) हे पाशहस्ते (हाथ में पाश धारण करने वाली) हे दण्डहस्ते ! हे भीमहस्ते! हे भयानके (भयानक आकार वाली) ॥१३९॥ हे चामुण्डे, हे ज्वलनास्ये (जलते हुए मुख वाली) हे तीक्ष्ण दंष्टे ! (तीक्ष्ण दांतों वाली) हे महाबले ! हे शिवयान प्रिये देवि ! हे प्रेतासन युते ! हे शिवे !।।१४०॥ हे भीमाक्षि, हे भीषणे देवि, हे सर्वभूतभङ्करि, हे करालि, हे विकरालि ! हे महाकालि ! हे करालिनि ॥१४१॥ हे कालि, हेकरालविक्रान्ते, हे कालरात्रि आपको नस्कार है । हे सर्वशस्तरभृते देवि (सभी शस्तरों को धारण करने वाली देवि) हे देवनमस्कृत ! तुम्हें नमस्कार है ॥१४२॥ इस तरह परमेष्ठी रुदर के द्वारा स्तुति किए जाने पर शिवदूती देवी अत्यन्त सन्तुष्ट हो गयीं और कहीं ॥१४३॥ हे देवेश ! आप अपनी इच्छा के अनुसार वरदान माँगें । रुद्र ने कहा-- हे वरानने देवि ! इस स्तोत्र के द्वारा जो लोग आपकी स्तुति करें ॥१४४॥ हे सर्वव्यापिके देवि ! उनको आप वरदान
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