Srishti Khanda Extracted Page 423

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-423

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Sanskrit Original

तासां गृहे यदा पूर्व ब्रह्माद्यास्सुरसत्तमा: । गंधर्वाप्सरसश्षैव यक्षास्सर्वे च गुह्यकाः॥११८॥ मेर्वादयः शिखरिणो गंगाद्याः सरितस्तथा । सर्वे नागा गजास्सिद्धाः पक्षिणोऽ सुरसूदना:॥११९॥ डाकिन्य: सहवेतालै वृताः सर्वै ग्रहै स्तदा । किमुक्तेनामुना देवि यत्सृष्टं ब्रह्मणा त्विह॥१२०॥ तत्सर्वं भोजनं दत्तं स्वेच्छान्नं च नभोगतम् । शिवदूत्युवाच आसां कृतं देहि भोज्यं दुर्लभं यात्त्रविष्टपे ॥१२९॥ स्नेहाक्तं सगुडं हृद्यं सुपक्वं परिकल्पितम्। क्वचिन्नान्येन यद्भुक्तमपूर्वं परमेश्वर ॥१२२॥ एवमुक्तस्तदासोऽपि देवदेवो महेश्वरः । भक्ष्यार्थं तास्तदा प्राह पार्वत्याश्चैव सन्निधौ ॥१२३॥ मया वै साधितं चान्नं प्रकारैर्बहुभिः कृतम्। तत् सर्व च व्ययं यातं नचान्यदिह दृश्यते ॥१२४॥ भवतीष्वागतास्वद्य किं मया देयमुच्यताम् । अपूर्वं भवतीनां यन्मयादेयं विशेषतः ॥१२५॥ आस्वादितं नचान्येन भक्ष्यार्थे च ददाम्यहम् । अधोभागे च मे नाभे वर्तुलौ फलसन्निभौ॥१२६॥ भक्षयध्वं हि सहितालंबौ मे वृषणाविमौ । अनेन चापि भोज्येन परातृप्तिर्भविष्यति॥१२७॥ महाप्रसादं ता लब्ध्वा देव्यस्सर्वास्तदा शिवम् । प्रणिपत्य स्थिताशशर्व इदं वचनमब्रवीत् ॥१२८॥ करिष्यंति शुभाचारान्विना हास्येन ये नराः । तेषां धनं पशुः पुत्रा दाराश्चैवगृहादिकम्॥१२९॥ भविष्यति मया दत्तं यच्चन्यन्मनसि स्थितम् । हास्येन दीर्घदशना दरिद्राश्च भवंति ते॥१३०॥ तस्मान्ननिंदाहास्यं च कर्तव्यं हि विजानता। भवत्यो मातरः ख्याता ह्यास्मिन्लोकेभविष्यथ ॥९३९॥ के द्वारा बनाये गये भोजन को खाने के लिए देव लोक से देवता आये ॥११७॥ उन मातृकाओं के गृह में सर्वप्रथम ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता आये । फिर गन्धर्व, अप्सरायें, यक्ष समस्त गुह्यक गण ॥११५१८॥ सुमेरु आदि पर्वत, गङ्गा इत्यादि नदियाँ, सभी नगर, सभी गज, सिद्ध, पक्षीगण, असुरों का मर्दन करने वाली ॥११९॥ वेतालों के साथ डाकिनियाँ, समस्त ग्रहगण भी आये । हे देवि ! अधिक क्या कहना है, ब्रह्माजी की सृष्टि में जितने जीव हैं, उन सबों को वहाँ भोजन कराया गया ॥१२०॥ आकाश पर्यन्त भरा हुआ अन्न, उनकी इच्छा के अनुसार दिया गया । शिवदूती ने कहा-- इन सबों को आप ऐसा भोजन दीजिए जो त्रैलोक्य में दुर्लभ हो ॥१२१॥ उसे स्निग्ध तथा गुण से युक्त, हृद्य तथा अच्छी तरह से पका हुआ होना चाहिए । हे परमेश्वर उस अन्न को ऐसा होना चाहिए कि उसको कहीं पर कोई खाया न हो ॥१२२॥ इस तरह कहने पर वे देवराध्य महेश्वर भी पार्वतीजी के सामने ही कहे॥ १२३॥ जिस अन्न को मैंने स्वयं अनेक प्रकार से सिद्ध किया है वह सब समाप्त हो गया है, उसका कोई भी अंश नहीं बचा है ॥१२४॥ आपलोग भोजन के लिए आयी हैं, अतएव बतलाइये कि मैं क्या दूँ । जो मेरे द्वारा दिया गया अन्न अपूर्व हो ॥१२५॥ अतएव जिसका किसी ने भी अस्वाद नहीं लिया है, उस अपूर्व अन्न को मैं दे रहा हूँ मेरी नाभि के नीचे जो दो गोल-गोल फल के समान वृषण (अण्डकोश) है ॥१२६। उसी को आप सभी खा लें । इस भोज्य पदार्थ से आपलोगों को अत्यन्त तृप्ति होगी ॥१२७॥ उस महाप्रसाद को प्राप्त करके सभी देवियों ने शिव को प्रणाम किया; उस समय शिव ने कहा ॥१२८॥ जो मनुष्य बिना हँसी उड़ाये मङ्गलमय आचारों को करेंगे, उन सबों को मैं धन, पशु, पुत्र, पत्नी तथा गृह आदि ॥१२९॥ प्रदान करूंगा तथा उनके मन में अन्य जो इच्छा होगी उसे भी मैं प्रदान करूंगा । जो लोग इसकी हँसी उड़ाते हुए अपना दाँत दिखायेंगे, उन लोगों को दारिद्र्य की प्राप्ति होगी ॥१३०॥ अतएव इस बात को जानने वाले को इसकी न तो निन्दा करनी चाहिए और न इसकी हँसी करनी

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