Srishti Khanda Extracted Page 422
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-422
Sanskrit Original
अन्यथा मामपि बलाद्धक्षयेयु बुभुक्षिता:। एवं मां तु समालक्ष्य भक्ष्यं कल्पय सत्वरम्॥१०४॥ रुद्र उवाच शिवदूति ब्रवीम्येकं प्रवृत्तं यद्युगांतरे। गङ्गाद्वारे दक्षयज्ञो गणैर्विध्वंसितो मम ॥१०५॥ तत्र यज्ञो मृगो भूत्वा प्रदुद्राव सुवेगवान् । मया बाणेन निर्विद्धो रुधिरेण प्रसेचितः ॥१०६॥ अजगंधस्तदाभूतो नाम देवैस्तु मे कृतम् । अजगंधस्त्वमेवेति दास्ये चान्यत्तु भोजनम्॥९०७॥ एतासां शृणु मे देवि भक्ष्यमेकं मयोचितम्। कथ्यमानं वरारोहे कालरात्रि महाप्रभे ॥१०८॥ या स्त्री सगर्भा देवेशि अन्यस्त्रीपरिधानकम् । परिथत्ते स्पृशेद्वापि पुरुषस्य विशेषतः॥९०९॥ स भागोस्तु वरारोहे कासांचित्पृथिवीतले । अप्येकवर्ष बालं तु गृहीत्वा तत्र वै बलात् ॥११०॥ भुक्त्वा तिष्ठंतु सुप्रीता अपि वर्षशतान्बहून् । अन्याः सूतिगृहेच्छिद्रं गृह्णीयुस्तु ह्यपूजिताः ॥११९१॥ निवसिष्यंति देवेशि तथा वै जातहारिकाः। गृहे क्षेत्रे तटाके च वाप्युद्यानेष चैव हि ॥११२॥ अन्येषु च रुदंत्यो या स्त्रियस्तिष्ठंति नित्यशः । तासां शरीरगाश्चान्याः काश्चित्तप्तिमवाघ्रुयुः ॥११३॥ शिवदूत्युवाच कुत्सितं भवता दत्तं प्रजानां परिपीडनम्। न च त्वं बुध्यसे दातुं शंङ्करस्य विशेषतः ॥९९४॥ त्रपाकरं यद्भवति प्रजानां परिपीडकम्। न तु तदयुज्यते दातुं तासां भक्ष्यं तु शङ्कर॥१९५॥ रुद्र उवाच अवंत्यां तु यदास्कंदो मया पूर्व तु भद्रितः । चूडाकर्मणि वृत्ते तु कुमारस्य तदा शुभे॥११६॥ आगत्य मातरो भक्ष्यमपूर्वतु प्रचक्रिरे । देवलोकाद्देवगणा मातृणां भोक्तुमागताः ॥११७॥ हुआ तो ये बलपूर्वक मुझको भी खा जायेंगी । इसतरह मुझको देखकर आप शीघ्र इन सबों के भोजन की व्यवस्था करें ।। १०४॥ रुद्र ने कहा-- हे शिवदूती मैं एक भक्ष्य बतला रहा हूँ जो दूसरे युग में हुआ था । गङ्गाद्धार (हरिद्वार) में मेरे गणों ने दक्ष के यज्ञ को विध्वस्त कर दिया था ॥१०५॥ वहाँ पर यज्ञ मृग का रूप धारण करके अत्यन्त वेग से भगा । उसे मैंने अपने बाण से मारा तो वह खून से रङ्ग गया ॥१०६।। वही अजगंध हो गया । उस समय देवताओं ने मुझे अजगन्ध नाम से कहा कि तुम ही अजगन्ध हो और अन्य भोजन भी मैं दूँगा ॥१०७॥ हे कालरात्रि ! हे महाप्रभे देवि ! इन सबों के लिए मैं एक उचित भोजन बतला रहा हूँ ॥१०८॥ यदि कोई गर्भवती स्री किसी दूसरी स्त्री के वस्त्रों को धारण करती या स्पर्श करती है, अथवा किसी पुरुष के वस्रों को पहनती या स्पर्श करती है ॥१०९॥ तो हे वराहे ! वह भाग इन देवियों में से कुछ का भाग बन जाय । उसके एक वर्ष के बालक को बलपूर्वक लेकर उसे ये खाकर सैकड़ों वर्षों तक तृप्त बनी रहें । कुछ देवियाँ सूतिका गृह में जब इनकी पूजा न हो तो वे वहाँ पर दोषों को देखती रहें वहीं पर वे निवास करें तथा उत्पन्न शिशु का हरण कर लें । यदि वे खियाँ गृह में, खेत में अथवा तलाब के किनारे या उद्यान में बैठकर रोती हैं तो कुछ देवियाँ उन स्त्रियों के शरीर में प्रवेश करके उनके शरीर को खाकर तृप्त हो जायँ ॥११०-११३॥ शिवदूती ने कहा-- आपने तो निन्दित तथा प्रजाओं को दु:ख देने वाला ही भक्ष्य इन सबों को प्रदान किया है । आप उस भक्ष्य को नहीं जानते हैं जो कल्याणकारी हो॥ ११४॥। हे शङ्कर ! जो लज्जाकारक तथा प्रजाओं को दुख देने वाला भक्ष्य हो उसे इन सबों को नहीं देना चाहिए।। ११५॥। रूद्र ने कहा-- अवन्ती नगरी में जब मैंने कार्तिकेय का मुण्डन संस्कार कराया, उस समय मङ्गलमय चूडाकरण संस्कार के अवसर पर ॥११६॥ आकर माठृकाओं ने अपूर्व भक्ष्य तैयार किया; उन मातृकाओं
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