Srishti Khanda Extracted Page 420
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-420
Sanskrit Original
पप्रच्छविस्मयाहेवी प्रोत्फुल्लांबुजलोचना । पृष्ठतो वो न पश्यामि भयं किंचिदुपागतम् ॥७६॥ कथं तु विद्ठुता देवाः सर्वे शक्रपुरः सराः । देवा ऊचुः अयमायाति दैत्येंद्रो रुरुभीमपराक्रमः ॥७७॥ चतुरंगेण सैन्येन महता परिवारितः । तस्माद्दीना वयं देवीं भवतीं शरणं गताः ॥७८॥ देवानामिति वै श्रुत्वा वाक्यमुच्चै र्जहास सा। तस्यां हसंत्यां निश्चेरुर्वरांग्यो वदनात्ततः ॥७९॥ पाशांकुशधराः सर्वाः पीनोन्नतपयोधराः । सर्वाश्शूलधरा भीमाः सर्वा दरष्ट्ाङ्कुशाननाः॥८ ०॥ आबद्धमकुटाः सर्वाः संदष्टदशनच्छदाः । फूत्काररावैरशिवै सत्रासयंत्यश्चराचरम् ॥८ १॥ काश्चिच्छुक्लाम्बरधरा: काश्चिच्चित्राम्बरा स्तथा । सुनीलवसनाः काश्चिद्रक्तपानातिलालसा: ॥८ २॥ नानारूपै ममुखैस्तास्तु नानावेषवपुर्धराः । ताभिरेवं वृता देवी देवानामभयंकरी ॥८३॥ माभैष्ट देवा भद्रं वो यावद्ददति दानवः । चतुरंगबलोपेतो रुरुस्तावत्समागतः ॥८ ४॥ तं नीलपर्वतवरं देवानां मार्गमार्गिणः। देवानामग्रतः सैन्यं दृष्ट्वा देवीसमाकुलम् ॥८५॥ तिष्ठतिष्ठेतिजल्पन्तो दैत्यास्ते समुपागताः । ततः प्रववृते युद्धं तासां तेषां महाभयम् ॥८६॥ नाराचे िन्नदेहानां दैत्यानां भुविसर्पताम् । रोषाहंडप्रभग्नानां सर्पाणामिव सर्पताम् ॥८७॥ शक्तिनिर्भिन्नहृदया गदासंचूणितोरसः। कुठारै भिन्नशिरसो मुसलैर्भिन्नमस्तकाः॥८८॥ विद्धोदरास्त्रिशूलाग्रै श्छिन्नग्रीवा वरासिभिः ।क्षताश्वर थमातंगपादाताः पेतुराहवे ॥८९॥ देवताओं को देखा ॥७५॥ विकसित कमल के समान नेत्रों वाली उस देवी ने उनसे पूछा-- आपलोग के पीछे किसी प्रकार का भय मैं नही देख रही हूँ ॥७६॥ इन्द्र आदि देवताओं तुम लोग क्यों भाग रहे हो । देवताओं ने कहा यह भयङ्कर पराक्रम वाला रुरु आ रहा है ॥७७॥ उसके साथ विशाल चतुरंगिणी सेना है । इसीलिए हे देवि ! इसी कारण से हमलोग आपकी शरण में आये हैं ॥७८॥ देवताओं की इस वाणी को सुनकर वे देवी जोर से हँस पड़ीं । उनके हंसते समय उनके मुख से श्रेष्ठ अङ्गों वाली देवियों का प्रादुर्भाव हुआ ॥७९॥ वे सब पाश, अङ्कुश आदि को धारण किये थीं, उनके स्तन मोटे तथा उन्नत थे । वे सब त्रिशूल धारए किए हुयी भयङ्कर थीं । उनके दांत अङ्कुश के समान थे ॥८०॥ वे सब मुकुट धारण किए हुए थीं और अपने ओठों को चबा रही थीं । वे अपने अशिव फुत्कारों से चराचर को भयभीत बना रही थीं ॥८१॥ उनमें से कुछ ने श्वेत वस्त्र को धारण किया था तथा कुछ चित्रविचित्र वस्त्र पहना था । कुछ के वस्त्र नीले थे; वे सब रक्त पीने की लालसा से युक्त थीं ॥८ २॥ उन सबों के मुख, वेष तथा शरीर अनेक प्रकार के थे । उन सबों से घिरी हुयी देवी ने देवताओ को अभय प्रदान किया ॥८३॥ देवी ने कहा-- देवताओं डरो मत, उसी समय रुरु भी अपनी चतुरङ्गिणी सेना के साथ वहाँ आ गया ॥८४॥ पर्वतों में श्रेष्ठ उस नीलगिरि पर देवताओं के मार्ग को खोजने वाले देवताओं के सामने विद्यमान दैत्यों की सेना को देवी ने देखा । उसके बाद ठहरो ! ठहरो !! कहते हुए दैत्य वहाँ आ गये । उसके बाद दैत्यों तथा देवियों में भयङ्कर युद्ध प्रारम्भ हो गया ॥८५-८६॥ बाणों से विधे हुए दैत्यों के शरीर पृथिवी पर गिरने लगे क्रोध करके दण्ड प्रहार करने के कारण फुटे शिर वाले दैत्य सर्पो के समान सरकने लगे ॥८७॥ शक्ति के प्रहार से जिनके शिर फट गये थे तथा गदा के प्रहार से जिनका हृदय चूर-चूर हो गया था तथा कुठार से जिनके शिर फट गये थे एवं मूसल प्रहार से जिनका शिर फट गया था ॥८८॥ त्रिशूल से जिन सबों का पेट चिर गया था तथा कृपाण से जिनका शिर कट गया
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