Srishti Khanda Extracted Page 419

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-419

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Sanskrit Original

असुरैरर्चित: श्रीमान् द्वितीयो नमुचिर्यथा । कालेन महता सो5थ लोकपालपुरं ययौ ॥६५॥ जिगीषुः सैन्यसंवीतो देवै वैरमरोचयत् । उत्तिष्ठतस्तस्य महासुरस्य समुद्रतोयं ववृथेतिवेगात्॥६६॥ अनेकनागभ्रहमीनजुष्ट माप्लावयत्पर्वतसानुदेशान् । अंतः स्थितानेकसुरारिसंघं विचित्रवर्मायुघचित्रशो भम् ॥६७॥ भीमं बलं चलितंचारुयोधं विनिर्ययौ सिंघुजलाद्विशालम् । तत्र द्विपा दैत्यभटाभ्युपेताः सयानघंटाश्च समृद्धियुक्ताः ॥६८॥ विनिर्ययुः स्वाकृतिभिर्झषाणां समत्वमुच्चैः खलुदर्शयन्तः । अश्वास्तथा कांचनसूत्रनद्धा रोहीतमत्स्या इव ते जलान्ते ॥६९॥ व्यवस्थितास्तैः सममेव तूर्णं विनियर्युर्लक्षशः कोटिशश्च । तथारव्तस्यंदनतुल्यवेगाः सचक्रदंडाक्षतवेणुयुक्ताः ॥७०॥ रथाश्च यंत्रोपरिपीडितां गा श्वलत्पताकाः स्वनितंविचक्रुः । तथैव योधाः स्थगितास्तरीभि स्तितीर्षवस्ते प्रवरास्त्रपाणयः ॥७ १॥ रणे रणे लब्धजयाः प्रहारिणो विरेजुरुच्चैरसुरानुगा भृशम् । देवेषु वै रणे तेषु विद्रुतेषु विशेषतः ॥७२॥ असुरास्सर्वदेवानामन्वधावंस्ततस्ततः । ततो देवगणाः सर्वे द्रवंतो भयविह्वलाः ॥७३॥ नीलं गिरिवरं जग्मुर्यत्र देवी स्वयं स्थिता। रौद्री तपोन्विताधन्या शांभवी शक्तिरुत्तमा ॥७४॥ संहारकारिणी देवी कालरात्रीति यां विदुः । सा तु दृष्ट्वा तदा देवान्भयत्रस्तान्वचेतसः ॥७५॥ अनेक करोड़ उत्तम कोटि के दैत्य उसकी पूजा करते थे । ऐश्वर्य सम्पन्न वह द्वितीय नमुचि के समान था । वह बहुत समय के बाद अपनी सेना के साथ विजय प्राप्त करने की इच्छा से लोकपालों की नगरी में गया । उसने देवताओं से वैर कर लिया । जिस समय वह महा असुर समुद्र से बाहर निकला उस समय समुद्र का जल अत्यन्त वेग से बढ गया ॥६४-६६॥ अनेक नाग, घडियाल तथा मत्स्य से युक्त वह जल पर्वत के शिखर तक फैल गया । समुद्र के भीतर विद्यमान दैत्य समूह अद्भुत प्रकार के कवचों से सुशोभित हो रहा था ॥६७॥ दैत्यों की भयङ्कर सेना चल पड़ी, बड़े-बड़े उसमें योद्धा थे । इस प्रकार की भयङ्कर सेना समुद्र से निकली । उस सेना के हाथियों पर विद्यमान वीर, विमानों तथा घण्टा से सुशोभित थे ॥६८॥ वे सबके सब समुद्र से निकले, उनकी आकृति बहुत अधिक जलचरों के समान थी, किञ्च उस सेना के सुवर्ण सूत्र से सुशोभित अश्व जल के भीतर रोहित (रोहू) मछली के समान प्रतीत होते थे ॥६९॥ उन सबों के साथ वे सभी दैत्य लाखों करोड़ों की संख्या में शीघ्र ही निकल पड़े । उनके रथों का वेग सूर्य के वेग के समान था और वे रथ चक्र, दण्ड तथा वेणु से युक्त थे ॥७०॥ यन्त्रों पर चढाये गये उन रथों की पताकाये फहरा रही थीं, उन सबों से ध्वनि होने लगी वीर भी अपने हाथ में अस्तर लेकर तैर जाना चाहते थे अतएव उन सबों ने नावों को रोक दिया ॥७१॥ इस तरह के उस असुर के अनुचर अनेक युद्धों में विजयी होने के कारण अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे । उन दैत्यों के साथ युद्ध करने में असमर्थ देवता जब भाग चले तो ॥७२॥ दैत्य भी उन्हें खदेड़ने के लिए उन देवताओं के पीछे-पीछे दौड़ पड़े । उस समय भयभीत वे देवता भागते हुए।॥७३॥ उस नीलगिरि पर पहुँचे जहाँ पर देवी स्वयं उपस्थित थीं । वह तपस्विनी भगवान् शङ्कर की उत्तम शक्ति थीं ॥७४॥ वे संहार करने वाली थीं । उनका ही नाम काली है । वे ही कालरात्रि हैं । उस देवी ने घबराये हुए

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