Srishti Khanda Extracted Page 418
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-418
Sanskrit Original
दृष्ट्वा नागांस्तथा श्रान्तान् वारिधाराश्च शीतला:। उदङमुखा वै निष्क्रांतास्सवेंषां तु सुखप्रदाः ॥५२॥ नागतीर्थं ततो जातं पृथिव्यां भरतर्षभ। नागकुंडं च वै केचित्सरितं चापरेऽब्रुवन् ॥५३॥ पुण्यं तत्सर्वतीर्थानां सर्पाणां विषनाशनम् । मज्जन्ति तत्र ये मर्त्या अधिश्रावणपंचमीम् ॥५४॥ न तेषां तु कुले सर्पाः पीडां कुर्वति कर्हिचित्। श्राद्धं पितृणां ये तत्र करिष्यंति नरा भुवि ॥५५॥ ब्रह्मा तेषां परं स्थानं दास्यते नात्र संशयः। नागानां तु भयं ज्ञात्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥५६॥ पूर्वोक्तं तु पुनर्वाक्यं नागानश्रावयत्तदा । पंचमी सा तिथिर्धन्या सर्वपापहरा शुभा ॥५७॥ यतोस्यामेव सुतिथौ नागानां कार्यमुद्धतम् । एतस्यां सर्वतोयस्तु कट्वम्लं परिवर्जयेत्॥५८॥ क्षीरेण स्नापयेन्नागां स्तस्य ते यांति मित्रताम् । भीष्म उवाच शिबदूती यथा जाता येन चैव निवेशिता ॥५९॥ तन्मे सर्व यथातत्वं भवान् शंसितुर्महति । पुलस्त्य उवाच शिवा नीलगिरि प्राप्ता तपसे धृतमानसा ॥६ ०॥ रौद्री जटोद्धवा शक्तिस्तस्याः श्रृणु जृपब्रतम्। तपः कृत्वा चिरं कालं ग्रसिष्याम्यखिलं जगत् ॥६ १॥ एवमुद्दिश्य पंचाम्निं साधयामास भामिनी । तस्याः कालांतरे देव्यास्तपंत्यास्तप उत्तमम् ॥६२॥ रुरुर्नाम महातेजा ब्रह्मदत्तवरोऽसुरः। सुद्रमध्येरत्नाख्यंपुरमस्ति महाधनम् ॥६ ३॥ तत्रातिष्ठत्स दैत्येंद्रस्सर्वदेवभयंकर: । अनेकशतसाहस्रकोटिकोटिशतोत्तमै: ॥६ ४॥ पुष्कर तीर्थ में यज्ञ कर रहे हैं, हमलोग चल कर उनको प्रसन्न करें ।वे प्रसन्न होकर हमलोगों को वरदान देंगे॥५०॥ इसतरह से विचार करके वे सभी नाग पुष्कर में जाकर यज्ञपर्वत पर जाकर पर्वत की दिवारों को ही अपना आश्रय बना लिए ॥५१॥ उन नागों को श्रान्त देखकर, उन सबों को सुख प्रदान करने वाली वहाँ से उत्तरामुखी शीतल जल की धारा निकली ॥५२॥ हे भरतर्षभ ! उसी से पृथिवी पर नागतीर्थ उत्पन्न हो गया । उसको कुछ लोगों ने नागकुण्ड कहा तथा कुछ लोगों ने नागनदी कहा ॥५३॥ वह समस्त तीर्थो सेबढकर अधिक पुण्यप्रद है तथा सर्पो के विष को विनष्ट करने वाला है । जो लोग श्रावण मास की पञ्चमी तिथि को उसमें स्नान करते हैं ॥५४॥ उनके वंश में कभी भी सर्प पीडा नहीं देते हैं, जो मनुष्य वहाँ पर अपने पितरों का श्राद्ध करेंगे ॥५५॥ उनको बह्याजी श्रेष्ठ स्थान प्रदान करेंगे । इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है । नागों के भय को जानकर लोक पितामह ब्रह्माजी ने ॥५६॥ नागों को पहले कहे गये वाक्य को पुन: सुनाया । वह सभी पापों को विनष्ट करने वाली शुभ पञ्चमी तिथि धन्य है॥५७॥ क्योंकि इसी तिथि को नागों का कार्य बतलाया गया है । इस तिथि कोजो व्यक्ति कटु तथा अम्ल (खट्टा) पदार्थों का परित्याग करेगा ॥५८॥ जो व्यक्ति इस तिथि को सर्पो को दुग्ध से स्नान करायेगा उसके साथ उन सर्पो की मित्रता हो जायेगी । भीष्मजी ने कहा-- शिवदूती तपस्या करने के लिए नीलगिरि पर आयी ॥६०॥ वे रुद्र की जटा से उद्भूत शक्ति स्वरूपिणी थीं । उनके मन में था कि दीर्घकाल तक तपस्या करके सम्पूर्ण जगत् को मैं खा जाऊंगी।।६ १॥ यही सोचकर वे पंचाग्नि की साधना करने लगीं । जब वे देवी घोर तपस्या कर रही थीं ॥६२॥ उसी समय रुरु नामक महातेजस्वी दैत्य हुआ । वह ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त किए था । वह समुद्र के भीतर विद्यमान अत्यधिक धन सम्पत्ति सम्पन्न रत्मपुर नामक नगर में रहता था ॥६३॥ वह सभी देवताओं के लिए भयङ्कर था ।
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