Srishti Khanda Extracted Page 417
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-417
Sanskrit Original
तदेकमनसः सर्वे शृणुध्वं मम शासनम् । सुतलं वितलं चैव तृतीयं च तलातलम् ॥३८॥ दत्तं च त्रिप्रकारं वो गृहं तत्र गमिष्यथ । तत्र भोगान् बहुविधान् भुंजाना मम शासनात्॥३९॥ तिष्ठध्वं सप्तमं यावत्कालं तं तु पुनः पुनः । ततो वैवस्वतस्यादौ काश्यपेयो भविष्यति ॥४०॥ दायादः सर्वदेवानां सुपर्णस्सर्पभक्षकः। तदा प्रसूतिः सर्पाणां दग्धा वै चित्र भानुना ॥४९॥ भवतां चैव सर्वेषां भविष्यति न संशयः । ये ये क्रूरा भोगिनो दुर्विनीतास्तेषामंतो भविता नान्यथैतत् ॥४२॥ कालव्याप्तं भक्ष्यध्वं च सत्वं तथापकारे च कृते मनुष्यम् । मंत्रौषधैर्गारुडैश्चैव तंत्रै ् बधेर्जुष्टा मानवा ये भवंति ॥४३॥ तेभ्यो भीतै ब्रर्तितव्यं नचान्य च्चिते कार्यं चान्यथा वो विनाशः । इतीरिते ब्रह्मणा वै भुजंगा जग्मुः स्थानं सुतलाख्यं हि सर्वे ॥४४॥ तस्थुर्भोगान्भुंजमानाश्च सर्वे रसातले लीलया संस्थितास्ते । एवं शापं तु ते लब्ध्वा प्रसादं च चतुर्मुखात् ॥४५॥ तस्थुः पातालनिलये मुदितेनांतरात्मना । ततः कालांतरे भूते पुनरेवं व्यचिंतयन् ॥४६॥ भविता भरतो राजा पांडवेयो महायशाः। अस्माकं तु क्षयकरो दैवयोगेन केनचित् ॥४७॥ कथंत्रिभुवने नाथः सर्वेषां च पितामहः । सृष्टिकर्ता जगद्वंद्ः शापमस्मासु दत्तवान्॥४८॥ देवंविरंचिनं त्यक्त्वा गतिरन्या न विद्यते । वैराजे भवनश्रेष्ठे तत्र देवः स तिष्ठति ॥४९॥ सदेवः पुष्करस्थो वै यज्ञं यजति सांप्रतम् । गत्वा प्रसादयामस्तं वरं तुष्टः प्रदास्यति ॥५०॥ एवं विचिंत्य ते सर्वे नागा गत्वा च पुष्करम् । यज्ञपर्वतमासाद्य शैलभित्तिमुपाश्रिताः ॥५ ९॥ ब्राह्मण तुम लोगों की रक्षा करने वाला होगा । वह तुम लोगों के वंश को पवित्र बना देगा । अब मैं मनुष्यों के साथ नागों का नियम बना देता हूँ ॥|३७॥ अतएव एकाग्र मन से तुमलोग मेरी आज्ञा को सुनो । तुमलोगों को मैं तीन प्रकार का गृह प्रदान करता हुँ, सुतल, वितल तथा तलातल । वहीं तुमलोग चले जाओंगे । वहाँ पर मेरी आज्ञा से तुमलोग बहुत प्रकार के भोगों को भोगोगे ॥३८-३९॥ और वहीं पर सातवें मन्वन्तर पर्यन्त निवास करना । उसके पश्चात् वैवस्वत मन्वन्तर के प्रारम्भ में कश्यप वंशीर्य सभी देवताओं के मित्र सुपर्ण होंगे । वे सपों के खाने वाले होंगे उसी समय अग्नि के द्वारा सर्पो की सन्तानें भस्म होंगी ॥४१। उस समय जो-जो सर्प क्रूर, भोगि सम्पन्न तथा दुर्विनीत होंगे उन सबों का नाश होयेगा ही ॥४१-४२॥ तुम लोग भी मनुष्य के मृत्यकाल आने पर तथा जो तुम लोगों का अपकार करे, ऐसे ही मनुष्य को काटना । जो मनुष्य गारुड मंत्र तथा औषधि से युक्त होंगे तथा तंत्रबन्ध से युक्त होंगे ॥४३॥ उन मनुष्यों से तुम लोग डरना । अन्यथा मनुष्यों को मत काटना नहीं तो तुमलोगों का नाश होगा । ब्रह्माजी.के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर वे सर्प सुतल लोक में चले गये ॥४४॥ वे वहाँ पर भोगों को भोगते हुए रहने लगे और वे लीलापूर्वक रसातल में स्थित रहे । इस प्रकार वे ब्रह्माजी से शाप तथा वरदान दोनों प्राप्त करके ॥४५॥ प्रसन्नता पूर्वक पाताल में ही रहने लगे । उसके बाद कुछ समय बीत जाने पर उन सबों ने सोचा॥४६॥ किसी दैवयोग से हमलोगों का नाश करने वाला पाण्डवों के वंश में राजा होने वाला है ॥४७॥ क्योंकि त्रिभुवन नाथ सबों के पितामह है जगदवंद्य तथा सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने हमलोगों को शाप दिया है ॥४८॥ ब्रह्माजी को छोडकर हमलोगों का रक्षक कोई दूसरा नहीं है और वे वैराज भवन में निवास करते हं ॥४९॥ वे बह्याजी इस समय
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