Srishti Khanda Extracted Page 416
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-416
Sanskrit Original
शशाप परमक्कुद्धो वासुकिप्रुखांस्तदा । ब्रह्मोवाच अहन्यहनि भूतानि भक्ष्यते वै दुरात्मभिः ॥२५॥ नश्यंति तूरगै दष्टा मनुष्याः पशवस्तथा । यस्मान्मत्प्रभवान्नित्यं क्षयं नयथ मानुषान्॥२६॥ अतोन्यस्मिन् भवेभूयान्मम कोपात् सुदारुणात्। भवतां हि क्षयो घोरो भावि वैवस्वतेंतरे ॥२७॥ तथान्यः सोमवंशीयो राजा वै जनमेजयः । धक्ष्यते सर्पसत्रेण प्रदीप्ते हव्यवाहने॥२८॥ मातृष्वसुश्च तनयां स्ताक्ष्यों वो भक्षयिष्यति। एवं वो भविता नाशः सर्वेषां दुष्टचेतसाम् ॥२९॥ शप्त्वा कुलसहस्रं तु यावदेकं कुलं स्थितम् । एवमुक्ते तु वेपंतो ब्रह्मणा भुजगोतमाः ॥३०॥ निपत्य पादयोस्तस्य इदमूचुर्वचस्तदा । भगवन् कुटिला जातिरस्माकं भूतभावन ॥३१॥ विषोल्बणत्वं क्रूरत्वं दंदशूकत्वमेव च । संपादितं त्वया देव इदानीं शपसे कथम्॥३२॥ ब्रह्मोवाच यदि नाम मया सृष्टा भवंतः कुटिलाशयाः । ततः किं बहुना नित्यं भक्षयध्वं गतव्यथाः ॥३३॥ नागा ऊचु: मर्यादां कुरु देवेश स्थानं चैव पृथक् पृथक्। मनुष्याणां तथास्माकं समयं देवकारय ॥३४॥ शापो यो भवतादत्तो मनुष्यो जनमेजयः । नाशं नः सर्पसत्रेण उल्बणं च करिष्यति ॥३५॥ ब्रह्मोवाच जरत्कारुरिति ख्यातो भविता ब्रह्मवित्तमः। जरत्कन्या तस्य देया तस्यामुत्पत्स्यते सुतः ॥३६॥ रक्षाकर्ता स वो विप्रो भवतां कुलपावनः। तथा करोमि नागानां समयं मनुजैः सह ॥३७॥ के बाद ब्रह्माजी ने सर्पो को बुलाकर ॥२४॥ उन वासुकि इत्यादि को अत्यन्त क्रोध पूर्वक शाप दिया । ब्रह्माजी ने कहा-- तुम दुष्टों द्वारा प्रजायें प्रतिदिन विनष्ट की जा रहीं हैं ॥२५॥ सर्पो द्वारा दंशे जाने के कारण मनुष्य तथा पशु मर जाते हैं, मुझसे उत्पन्न मनुष्यों का प्रतिदिन क्षय हो रहा है ॥२६॥ अतएव दूसरे जन्म में मेरे भयङ्कर क्रोध के कारण होने वाले वैवस्वत मन्वन्तर में तुमलोगो का भयङ्कर नाश होगा ॥२७॥ उस समय सोमवंशीय राजा जनमेजय होंगे । वे सर्प सत्र के द्वारा तुम लोगों को जलती हुयी अग्नि में भस्म कर देंगे ॥२८॥ तुम लोगों की माता, वहन तथा पुत्रों को गरुड खा जायेगा । इस तरह दुष्ट अन्तःकरण वाले तुम सबों का नाश हो जायेगा ॥२९॥ हजारों सर्प वंश को शाप देकर ब्रह्माजी ने कहा कि तुम लोगों का एक ही वंश रह जायेगा । ब्रह्माजी के द्वारा इस प्रकार के शाप दिए जाने पर सभी सर्प भय से काँपने लगे ॥३०॥ वे ब्रह्माजी के पैर पर गिरकर उनसे कहे--- हे भूतभावन भगवन्! हमारी जाति ही अत्यन्त कुटिल है ॥३१॥ इस जाति में आपने ही विष के कारण भयङ्करता, क्रूरता तथा दंदशूकता का निर्माण किया है । अब शाप क्यों दे रहे हैं ॥३२॥ ब्रह्माजी ने कहा-- यदि मैने तुम लोगों को कुटिल आशय वाला बनाया है, तो तुम लोग अधिक प्रजाओं को प्रतिदिन क्यों काटते हो ॥३३॥ नागों ने कहा-- हे देवेश ! आप हमलोगों की तथा मनुष्यों की अलग-अलग व्यवस्था कीजिये । आपने जो हमलोगों को शाप दे दिया है, वह मनुष्य जनमेजय, सर्पसत्र के द्वारा जो हमलोगों का नाश करेगा, उसके लिए एक आप सीमा निर्धारित करके नियम बना दीजिये ।।३४-३५॥ ब्रह्माजी ने कहा-- भविष्यत् काल में ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ जरत्कारु ऋषि होंगे । उनका विवाह तुमलोग जरत् नाम की अपनी कन्या से कर देना । उसके गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न होगा ॥३६॥ वही
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