Srishti Khanda Extracted Page 415
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-415
Sanskrit Original
कक श्रीपद्ममहापुराण उत्पत्तिरेषा ते सर्वा कथिता कुरुनंदन । नागानां तु यथा तीर्थ तच्छृणुष्व महात्रत ॥१२॥ अनंतो वासुकिश्चैव तक्षकश्च महाबलः । कर्कोटकश्च नागेंद्रः पद्मश्चान्यः सरीसृपः ॥१३॥ महापद़स्तथा शङ्खकः कुलिकश्चापराजितः। एते कश्यपदायादा एतैरापूरितं जगत् ॥९४॥ एतेषां तु प्रसूत्या तु इदमापूरितं जगत् । कुटिला भीमकर्माणस्तीक्ष्णास्याश्चविषोल्वणाः ॥१५॥ दष्ट्वा मंदांश्च मनुजान् कुर्युर्भस्म क्षणात्तु ते । तद्दर्शनाद्धवेज्नाशो मनुष्याणां नराधिप॥१६॥ अहन्यनि जायेत क्षयः परमदारुणः । आत्मनस्तु क्षयं दृष्टवा प्रजास्सर्वास्समंततः ॥१७॥ जग्मुः शरण्यं शरणं ब्रह्माणं परमेश्वरम्। इममेवार्थमुद्दिश्य प्रजाः सर्वा महीपते॥१८॥ ऊचुः कमलजं दृष्ट्वा पुराणं ब्रह्मसंज्ञकम् । प्रजा ऊचुः देवदेवेश लोकानां प्रसूते परमेश्वर ॥१९॥ त्राहि न स्तीक्ष्णदंष्ट्राणां भुजगानां महात्मनाम् । दिने दिने भयं देव पश्यामः कृपणा भृशम्॥२०॥ मनुष्यपशुपक्ष्यादि तत् सर्व भस्मसाद्भवेत् । त्वया सृष्टिः कृता देव क्षीयते तु भुजंगमैः ॥२९॥ एतज्ज्ञात्वा यदुचितं तत्कुरुष्व पितामह । ब्रह्मोवाच अहं रक्षां विधास्यामि भवतीनां न संशयः ॥२२॥ व्रजध्वं स्वनिकेतानि नीरुजो गतसाध्वसाः। एवमुक्ते प्रजाः सर्वा ब्रह्मणाव्यक्तमूर्तिना ॥२३॥ आजग्मुः परम प्रीताः स्तुत्वा चैव स्वयं भुवम् । प्रयातासु प्रजास्वेवं तानाहूय भुजंगमान्॥२४॥ भी वामन का अवतार पहले के ही समान हुआ था । उसके बाद वामन त्रिविक्रम बनकर बढ गये ॥११॥ हे कुरुनंदन ! इनकी उत्पत्ति सम्बन्धी सम्पूर्ण कथा मैं तुम्हें सुना चुका हँ, अतएव हे महात्रत भीष्म ! अब आप नागतीर्थ की उत्पत्ति की कथा को सुनें ॥१२॥ अनन्त, वासुकि, महाबलवान् तक्षक, नागेन्द्र, कर्कोटक तथा पद्म नामक सरीसृप (सर्प) ॥१३॥ महापद्म, शंङ्ख तथा कभी पराजित नहीं होने वाले कुलिक, ये सभी महर्षि कश्यप की सन्तान हैं । इन सबों के द्वारा जगत् भर गया ॥१३-१४॥ ये सभी कुटिल, भयङ्कर कर्म करने वाले, तीक्ष्ण मुख वाले तथा भयङ्कर विष वाले हैं । इनकी सन्तान से ही जगत् भर गया ॥१५॥ ये दुष्ट मनुष्यों को दंश कर उन सबों को क्षण भर में भस्म कर देते थे । हे नराधिप ! उसे देखकर मनुष्यों ने सोचा कि इस तरह से तो मनुष्यों का नाश ही हो जायेगा ॥१६॥ इन सबों द्वारा प्रतिदिन अत्यन्त भयङ्कर नाश होगा । इस तरह से अपने नाश को देखकर सभी प्रजायें ॥१७॥। सबों के रक्षक ब्रह्माजी के शरण में गयीं हे राजन् ! इसी विषय में सभी प्रजाओं ने ॥१८॥ पुराणपुरुष ब्रह्माजी का दर्शन करके उनसे कहा-- प्रजाओं ने कहा हे देव देवेश्वर ! प्रजाओं के परम स्वामिन्!॥१९॥ आप हमलोगों की तीक्ष्ण दाँतों वाले सर्पो से रक्षा करें हे देव ! हमलोग अत्यन्त भयभीत हैं, हमरा भय प्रतिदिन बढता जा रहा है ॥२०॥ उन सबों के कारण सभी मनुष्य, पशु तथा पक्षी भस्म हो जायेंगे । हे देव ! आपने तो सृष्ट की है और ये सर्प उसका नाश कर रहे हैं ॥२१॥ हे पितामह ! इस बात को जानकर आप जो उचित हो वही कीजिये । ब्रह्माजी ने कहा-- मैं निश्चित रूप से तुम सबों की रक्षा करूँगा ॥२२॥ तुम लोग अपने घर जाओ, और रोग तथा भय से रहित होकर रहो । अव्यक्त मूर्ति ब्रह्माजी द्वारा इसतरह से कहे जाने पर ॥२३॥ सारी प्रजाओं ने स्वयम्भु ब्रह्माजी की स्तुति की और अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक वे सब अपने-अपने घर चली गयीं । प्रजाओं के चले जाने
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