Srishti Khanda Extracted Page 414

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-414

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Sanskrit Original

इकतीसवाँ अध्याय भोष्म उवाच भगवन्महदाश्चर्य वाष्कले व॑धनं हि यत् । कृतं त्रिविक्रमं रूपं यदासंयमितो बलिः ॥१॥ एतन्मयाश्रुतं पूर्वं कथ्यमानं द्विजोत्तमैः । पाताले वसतेद्यापि वैरोचनसुतो बलिः ॥२॥ नागतीर्थं यथाभूतं पिशाचानां तु संभवम्। शिवदूती कथं चात्र केनेयं मंगली कृता॥३॥ अंतरिक्षे पुष्करं तु केन नीतं महामुने। एतदाचक्ष्व मे सर्वं यथवाष्कलिबंधनम् ॥४॥ भूमिप्रक्रमणं पूर्व कृतं देवेन विष्णुना । द्वितीये कारणं किं च येन देवश्चकार ह ॥५॥ तत्त्वतस्त्वं हि तत्सर्वं यथाभूतं तथा वद। पापक्षयकरं होतच्छोतव्यं भूतिमिच्छता ॥६॥ पुलस्त्य उवाच प्रश्नभारस्त्वया राजन् कौतुकादेव कीर्तितः । कथयामि हि तत् सर्व यथाभूतं जृपोत्तम॥७॥ विष्णोः पदानुषंगेण बंधनं वाष्कलेरिह। श्रुतं तद्भवता सर्व मया ते परिकीर्तितम् ॥८॥ भूयोपि विष्णुना भीष्म प्राप्ते वैवस्वतेंतरे। त्रैलोक्यं बलिना क्रांतं विष्णुना प्रभविष्णुना॥९॥ गत्वा त्वेकाकिना यज्ञे तथा संयमितो बलिः । भूयोपि देवदेवेन भूमेः प्रक्रमणं कृतम् ॥१०॥ प्रादुर्भावो वामनस्य तथाभूतो नराधिप । पुनस्त्रिविक्रमो भूत्वा वामनोभूदवामनः ॥११॥ नागतीर्थ का वर्णन, जनमेजय सर्पो को भस्म कर देंगे इस तरह से ब्रह्माजी का सर्पो को शाप; सर्पो की प्रार्थना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी का उच्छापन करना कि जरत्कारु के पुत्र आस्तिक द्वारा सर्पो की रक्षा हो जायेगी, नागतीर्थ की उत्पत्ति का वर्णन, श्रावणशुक्ल पञ्चमी तिथि को नागतीर्थ में श्राद्ध आदि करने का माहात्म्य, शिवदूती का चरित्र वर्णन, रुरु दैत्य से भयभीत देवताओं का नीलगिरि पर जाकर देवी की प्रार्थना करना, देवी के मुख से अन्य देवियों की उत्पत्ति, देवीगण और दैत्यगण का युद्ध, शिवकृत शिवदूती स्तोत्र, शिवदूति द्वारा शिव को वर प्रदान और स्तोत्र महिमा भीष्मजी ने कहा-- हे भगवन् ! यह बहुत बड़े आश्चर्य की बात है कि वाष्कलि भी बन्धन गत हो गये । भगवान् ने त्रिविक्रम रूप धारण करके बलि को बाँध दिया ॥१॥ ब्राह्मणों द्वारा कहे जाते हुए मैंने सुना है कि विरोचन के पुत्र बलि आज भी पाताल में रहते हैं ॥२॥ जिस तरह से नागतीर्थ उत्पन्न हुआ, पिशाचों की उत्पत्ति कैसे हुयी ? शिवदूती कैसे उत्पन्न हुयी ? उसे मङ्गलमयी किसने बनाया ?॥३॥ हे महामुने ! अंतरिक्ष में विद्यमान पुष्कर को किसने लाया ? इन सारी बातों को तथा बाष्कलि के बन्धन के प्रसङ्ग को आप मुझे सुनायें ॥४।। श्रीभगवान् ने प्रथम डग में पृथिवी को नाप लिया, दूसरे में ध्रुवलोक को नापने का क्या कारण था 2॥५॥ ये सारी बातें जैसे हुयीं उसे आप मुझे ठीक-ठीक बतलाइये । ये सारी कथायें पाप को विनष्ट करने वाली हैं, ऐश्वर्य चाहने वाले को इसे सुनना चाहिए ॥६॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे राजन् ! तुमने कौतुक वशात् प्रश्नों का बोझ मेरे ऊपर डाल दिया, ये सारी बातें जैसे हुयीं उसे में बतला रहा हूँ ॥७। भगवान् विष्णु के पद के ही सम्बन्ध में बाष्कलि का बन्धन हुआ, उन सारी बातों के मैनें कहा भी और आपने सुना भी है ॥८॥ उसके बाद जब वैवस्वत मन्वन्तर हुआ उस समय भगवान् विष्णु ने त्रैलोक्य को नापने का काम किया ॥९॥ उस समय भगवान् अकेले बलि के यज्ञ में गये, और बलि को बाँध दिए । उस समय भी देवेदेव भगवान् विष्णु ने भूमि को एक डग में नापा ॥१०॥ हे राजन् ! उस समय

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