Srishti Khanda Extracted Page 413

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-413

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Sanskrit Original

वाष्कलिरुवाच विज्ञप्तोहि तदा तेन देवदेवो जनार्दनः । भक्तिवृणोमि देवेश त्वद्धस्तान्मरणं हि मे ॥१९९॥ ब्रजामि श्वेतद्वीपं ते दुर्लभं तु तपस्विनाम्। आहैवमुक्तेविष्णुस्तां तिष्ठस्वैक युगांतरम् ॥१९२॥ वाराहरूपी यदाहं प्रवेक्ष्यामि धरातलम् । तदा हनिष्येहं त्वां तु मदग्रे च यदैष्यसि ॥१९३॥ उक्तोऽथ दानवस्तेन अपासर्प्पत्तदग्रतः । वामनेन समाक्रांताः सर्वेलोकास्तदानृप ॥९९४॥ असुरैस्तैस्तदात्यक्तं देवानां सत्यभाषणम् । देवो हृत्वा तु त्रैलोक्यं जगामादर्शनं विभुः ॥१९५॥ पातालनिलयश्चापि सुखमास्ते स वाष्कलिः । शक्रोपि पालयामास विपश्चिद्धुवनत्रयम् ॥१९६॥ अयं त्रैविक्रमो नाम प्रादुर्भावो जगहुरोः । गंगासंभवसंयुक्तस्सर्वकिल्विषनाशनः ॥१९७॥ विष्णोः पदानामेष त उत्पत्तिः कथिता नृप। यां श्रुत्वा तु नरो लोके सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९८॥ दुःस्वप्नं दुर्विचित्यं च दुःष्करं दुःष्कृतानि च । क्षिप्रंहि नाशमायांति दृष्टो विष्णुपदत्रये ॥१९९॥ युगानुक्रमशो दृष्ट्वा पापिनो जंतवस्तथा। सूक्ष्मता दर्शिता भीष्म विष्णुना पददर्शने ॥२००॥ यस्त्वारोहति तस्मिस्तु मौनवान्मानवो भुवि । कृत्वा त्रिपुष्करीं यात्रामश्वमेधफलं ब्रजेत् ॥२०९॥ मुच्यते सर्वपापैश्च मृतो विष्णुपुरं व्रजेत् ॥२०२॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे विष्णुपदोत्पत्तिर्नाम त्रिंशोध्यायः ॥३०॥ > जिससे कि मैं तपस्वियों को भी दुर्लभ श्वेतद्वीप में जा सकूँ । इस पर भगवान् विष्णु ने कहा अभी इसी तरह बने रहो, दूसरे युग के आने पर जब में वाराह रूप धारण करके पृथिवी का उद्धार करूंगा, उस समय जब तुम मेरे सामने आओगे तो मैं तुम्हारा वध करूँगा ॥१९२-१९३॥ इस तरह से कहने पर वाष्कलि भगवान् वामन के सामने से हट गया । हे राजन् ! उस समय वामन ने सभी लोकों को आक्रान्त किया ॥१९४॥ उसी समय से दैत्यों ने देवताओं से सत्य बोलना छोड़ दिया । भगवान् त्रैलोक्य का अपहरण करके अन्तर्धान हो गये ॥१९५॥ वाष्कलि भी उसी समय से सुखपूर्वक पाताल में रहने लगे; बुद्धिमान इन्द्र भी त्रैलोक्य का पालन करने लगे । गङ्गा की उत्पत्ति से सम्बद्ध जगदगुरु भगवान् त्रिविक्रम की उत्पत्ति की कथा सम्पूर्ण पापों को विनष्ट करने वाली है ॥१९७॥ हे राजन् इस प्रकार से मैंने विष्णु भगवान् के चरणों की उत्पत्ति की कथा आपको बतलायी । इस कथा का श्रवण करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥१९८॥ यज्ञपर्वत पर विद्यमान श्रीभगवान् के इन तीनों चरणों का दर्शन करने से दुःस्वप्न, दुर्विचार, दुष्कर कृत्य तथा पाप शीघ्र ही विनष्ट हो जाते हैं ॥१९९॥ देखा गया है कि पापी जीव भी युग के क्रम से दर्शन करके विष्णु पद का दर्शन करने में सूक्ष्मता का प्रदर्शन करते हैं ॥२००॥ जो मनुष्य मौन होकर उस यज्ञपर्वत पर आरोहण करता है तीनों पुष्करों की यात्रा करता है वह अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त करता है ॥२०१॥ वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और भगवान् विष्णु के लोक में जाता है । इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के विष्णुपद की उत्पत्ति नामक तीसवे अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ३०।। ke

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