Srishti Khanda Extracted Page 412

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-412

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Sanskrit Original

पदानि यानि जातानि वैष्णवानि धरातले । तत्राश्रमे तु यो गत्वा स्नानं वाप्यां समाचरेत्॥१७७।॥। अश्वमेधफलं तस्य दर्शनादेव जायते। एकविशगणोपेतो वैकुंठे वासमाप्नुयात्॥१७८॥ भुक्तवा तु विपुलान् भोगान् कल्पानां तु शतत्रयम् । तदंते जायते राजा सार्वभौमः क्षिताविह ॥९७९॥ तोयधारा तु सा भीष्म अङ्गुष्ठाग्राद्विनिः सृता। नदी सा वैष्णवी प्रोक्ता विष्णुपादसमुद्धवा ॥१८०॥ अनेन कारणेनाभूहंगा विष्णुपदी नृप । यया सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१८१॥ अङ्कुष्ठाग्रक्षतादंडाद्यत्प्रविष्टं जलं शुभम्। प्राप्तं देवनदीत्वं तु या तु विष्णुपदी नदी॥९८२॥ देवनद्या तया व्याप्तं ब्रह्मांडं सचराचरम् । विभूतिभिर्महाभाग सर्वानुग्रहकाम्यया॥१८ ३॥ सबाष्कलिर्वामनेन उक्तःपूरय मे क्रमान् । अधोमुखस्तदा जात उत्तरं नास्य विंदति ॥१८४॥ मौनीभूत तु तं दृष्ट्वापुरोधा वाक्यमब्रवीत् । स्वाभाविकी दानशक्ति नतु स््रष्टुंवयं क्षमाः ॥१८५॥ यावतीयं धरा देव सा दत्तानेन ते प्रभो। उक्तो बाष्कलिना विष्णुर्यावन् मात्रा वसुंधरा ॥१८६॥ या सृष्टा भवता पूर्व सा मया न च गोपिता। अल्पा भूमिर्भवान् दीर्घो न तु सृष्टेरहंक्षम: ॥१८७॥ इच्छाशक्तिः प्रभवति प्रभोस्ते देवसर्वदा । निरुत्तरस्तदाविष्णुर्मत्वा तं सत्यवादिनम् ॥१८८॥ ब्रूहि दानवमुख्यत्वं कंते कामं करोम्यहम्। ममहस्तगतं तोयं त्वया दत्तं तु दानव ॥१८९॥ तेन त्वं वरयोग्योसि वराणां भाजनं शुभम्। दास्येहं भवतः काममर्थी येन वृणुष्व ह ॥१९०॥ करके वह जल धारा भगवान् विष्णु के पैरों को धोकर उस यज्ञपर्वत को धोती हुए पुष्कर में प्रवेश कर गयी। १७६॥ इस धरातल पर भगवान् विष्णु के जो पैर पड़े उस आश्रम में जाकर जो व्यक्ति स्नान करेगा ॥१७७॥ उसके देखने मात्र से अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होगा । वह अपने इक्कीस पीढी के पितरों के साथ वैकुण्ठ में निवास करेगा १७८॥ वह तीन सौ कल्पो तक वहाँ पर प्रभूत मात्रा में भोगों को भोगकर उसके अन्त में भूलोक में सार्वभौम (चक्रवर्ती) राजा होगा ॥१७९॥ हे भीष्म ! श्रीभगवान् के अङ्गुठे के अग्रभाग से निकली हुयी वह जल की धारा भगवान् विष्णु के चरण से निकलने के कारण वैष्णवी नदी कही गयी है ॥१८०॥ इसी कारण गङ्गानदी विष्णुपदी कही जाती है वह नदी सम्पूर्ण चराचरात्मक त्रैलोक्य में व्याप्त है ॥१८१॥ अङ्गुठे के अग्रभाग से क्षत हो जाने से उस ब्रह्माण्ड से जो जल निकला वह देवनदी बन गया वही विष्णुपदी नदी है ॥१८२॥ लोकों पर कृपा करने की इच्छा से वह देवनदी अपनी विभूतियों द्वारा सम्पूर्ण त्रैलोक्य में व्याप्त है ।॥१८३।। उसके बाद वामन भगवान् ने वाष्कलि से कहा मेरे तीन डगों की पूर्ति करो । यह सुनकर वाष्कलि ने अपना मुखड़ा नीचे कर लिया । उसके पास कोई उत्तर नहीं था ॥१५८४॥ वाष्कलि को मौन देखकर पुरोहित शुक्राचार्य ने कहा हमलोगों में स्वाभाविक दानशक्ति ` की सृष्टि करने की क्षमता नहीं है ॥१८५॥ यह जितनी बड़ी पृथिवी है उसे तो इसने आपको दे दिया है । वाष्कलि ने कहा पृथिवी जितनी बड़ी है ॥१८६॥ आपने जितनी बड़ी पृथिवी को बनाया है उसे मैने दे दिया उसमें से कुछ मी नहीं छिपाया है ॥१८७॥ हे प्रभो ! आपकी इच्छा शक्ति ही बलवती है । उस सत्यवादी वाष्कलि को निरुत्तर समझकर भगवान् विष्णु ने कहा ॥१८८॥ हे दानवराज ! आप बतलाइये मैं आपकी किस इच्छा की पूर्ति करूँ । दानव ! तुमने मेरे हाथ पर सङ्कल्प का जल दिया है ॥१८९॥ अतएव तुम वर प्राप्त करने के योग्य हो, तुम वरदान के उत्तम अधिकारी हो, तुम जो चाहो उसे मैं तुम्हें दूँगा; वरदान माँगों ॥१९०॥ इस पर वाष्कलि ने भगवान् जनार्दन से कहा-- हे देवेश मैं आपकी भक्ति को प्राप्त करना चाहता हूँ, तथा आपके ही हाथों मृत्यु चाहता हुँ। १९ १॥

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