Srishti Khanda Extracted Page 411
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-411
Sanskrit Original
अपीडाकारियहानं तद्दानमिह दीयते । पीडाकारि च यद्दानं तद्दानं समलं स्मृतम् ॥१६५॥ एतच्छुत्वा गुरुस्तत्र त्रपयाधोमुखः स्थितः । वाष्कलिरुवाच अर्थिता भवतो देव देया सर्वा धरा मया ॥१६६॥ त्रपाकरं भवेन्मह्यं यदस्य भू पदत्रयम् । इंद्र उवाच सत्यमेतद्दानवेन्द्र यदुक्तं भवता हि मे ॥१६७॥ भूमेः पदत्रयार्थित्वं द्विजेनानेन मे कृतम्। एतावता त्वयंचार्थी मयाप्यस्य कृते भवान् ॥१६८॥ दनुपुत्रो याचितोसि वरमेतत्प्रदीयताम्। बाष्कलिरुवाच पदत्रयं वामनाय देवराजप्रतीच्छ मे ॥१६९॥ तत्रस्वं सुचिरं कालं सुखी सुरपते वस । एवमुक्त्वा वाष्कलिना वामनाय पदत्रयम् ॥९७०॥ तोयपूर्व तदा दत्तं प्रीयतां मे हरिः स्वयम् । दत्ते तु दानवेंद्रेण त्यक्त्वा रूपं च वामनम् ॥९७९॥ हरिराचक्रमे लोकान् देवानां हितकाम्यया । यज्ञपर्वतमासाद्य गत्वा चैव उदङ्मुखः ॥९१७२॥ देवस्य वामचरणे निविष्टो दानवालयः । तत्र क्रमं स प्रथमं ददौ सूर्येजगत्पतिः ॥१७३॥ द्वितीयं चध्रुवे देवस्तृतीयेन चपार्थिव। ब्रह्मांडस्ताडितस्तेन देवेनाद्ुतकर्मणा ॥१७४॥ अङ्गुष्टाग्रेणभिन्नेडे जलं भूरिविनिःसृतम्। प्लावयित्वा ब्रह्मलोकान्सर्वान् लोकाननुक्रमात् ॥१७५॥ श्रुवस्थानं सूर्यलोकं प्लाव्यतं यज्ञपर्वतम् । प्रविष्टापुष्करं धारा धौत्वा विष्णुपदानि सा॥१७६॥ इसी बात का विचार करके मैं इस वामन को अपने प्राणों को भे दे दूँगा और इन्द्र को त्रैलोक्य का राज्य दे दुँगा।१६४॥ जो दान पीडा देने वाला नहीं होता है उसी प्रकार का दान मैं देता हूँ । जो दान देने से कष्ट होता है, वह दूषित दान है ॥१६५॥ वाष्कलि की इन बातों को सुनकर गुरु शुक्राचार्य अपना मुख नीचे कर लिए । वाष्कलि ने कहा-- हे देव यदि आप मांगे तो मैं सम्पूर्ण पृथिवी आपको दे दूँ ॥१६६॥ यह तो मेरे लिए लज्जास्पद है कि में इसे तीन पग पृथिवी दे रहा हूँ । इन्द्र ने कहा-- हे दानवेन्द्र ! आपने जो कहा है, वही सत्य है ॥१६७॥ इस ब्राह्मण ने तीन पग पृथिवी के लिए मुझे आपका अर्थी बनाया है । इसको इतना ही चाहिये और मैने भी इसके लिए इतनी ही भूमि की याचना की है ॥१६८॥ हे दानव ! मैंने आपसे जो याचना की है, वह इसे प्रदान कीजिये । वष्कलि ने कहा-- हे देवराज ! आप मुझसे इस वामन के लिए तीन पग पृथिवी लीजिए ॥१६९॥ हे सुरपते ! वहाँ पर आप सुखपूर्वक चिरकाल तक निवास करें । यह कहकर वाष्कलि ने वामन को तीन पग पृथिवी संकल्प पूर्वक देकर कहा इससे श्रीभगवान् प्रसन्न हों । दानवेन्द्र के द्वारा दान दे देने पर श्रीहरि ने अपने वामन रूप को त्याग करके देवताओं का कल्याण करने के लिए लोकों को भी पार कर गये । यज्ञ पर्वत के ऊपर उत्तराभिमुख होकर॥ १७१-१७२॥ श्रीभगवान् का वायाँ पैर दानवों के लोक में प्रवेश कर गया । भगवान् ने पहले डग में सूर्यलोक को नाप लिया । दूसरे पग में ध्रुवलोक को नापा तीसरे डेग में उनके पैर ने ब्रह्माण्ड का स्पर्श कर लिया। भगवान् के अङ्गूठे के अग्र भाग से ब्रह्माण्ड के फूट जाने से उस ब्रह्माण्ड से बहुत अधिक जल निकला । उसने क्रमशः ब्रह्मलोक को सींचकर सभी लोकों को सींच दिया ॥१७३-१७५॥ धुवस्थान तथा सूर्य लोक के प्लावित
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