Srishti Khanda Extracted Page 410

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-410

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

युक्तायुक्तं न जानासि देयं कस्य मया क्वचित्। मंत्रिभिः सुसमालोच्य युक्तायुक्तं परीक्ष्य च ॥१५०॥ प्राप्त त्रैलोक्यराज्यत्वं जित्वा देवान् सवासवान् । वाक्यस्यास्यावसानेव भवान् प्राप्स्यति बंधनम् ॥१५ १॥ य एष वामनो राजन्विष्णुरेव सनातनः । नास्य वै भवता देयं पिता ते घतितः स्वयम्॥१५२॥ अयं ते पितृहा प्राप्तो मातृहा बंधुघातकः । वंशोच्छेदकरस्तुभ्यं भूतश्चैव भविष्यति॥१५३॥ न चैष धर्म जानाति शक्रादीनां हि ते रतः । मायाविना दानवा ये मायया येन निर्जिताः ॥१५४॥ मायया ब्राह्मणं रूपं वामनं च प्रदर्शितम्। अत्र कि बहुनोक्तेन नास्य देयं तु किंचन॥१५५॥ मक्षिकापादमात्रं तु भूमिरस्य प्रतिग्रहः । विनाशमेष्यसि क्षिप्रं सत्यं सत्यं मया श्रुतम् ॥१५६॥ गुरुणाप्येवमुक्तस्तु भूयो वाक्यमथाब्रवीत् । धर्मार्थिना मया सर्व प्रतिज्ञातं गुरोत्विदम्॥१५७॥ प्रतिज्ञापालनं कार्य सतां धर्मः सनातनः । यद्येष भगवान् विष्णुर्नास्ति धन्यतरो मया ॥१५८॥ गृह्मप्रतिग्रहं मत्तो यदि देवान् बुभूषति । भूयोपि धन्यतां नीतो देवेनानेन वै गुरो ॥१५९॥ यं योगिनो ध्यानयुक्ता ध्यायमाना हि दर्शनम् । न लभंते तथाविप्रा स्सोऽयं दृष्टो मयाद्य वै ॥१६०॥ दानानि ये प्रयच्छंति सकुशोदकपाणिना । प्रीयतां भगवान् विष्णुः परमात्मा सनातनः॥९१६९॥ एवमुक्ते तु वचने अपवर्गस्य भागिनः । यदत्र कार्यकरणे विकल्पो मे बभूव ह॥१६२॥ उपदिष्टोस्मि भवता बालत्वे चावधारितम् । शत्रावपि गृहायाते मास्त्वदेयं तु किंचन ॥१६३॥ एतदेवविचिंत्याहं प्राणानपि स्वकान्गुरो। वामनस्य प्रदास्यामि शक्रस्यापि त्रिविष्टपम् ॥९६४॥ अपने मन्त्रियों से सलाह करना चाहिए । फिर उचित अनुचित की परीक्षा करके कुछ करना चाहिए ॥१५०॥ आपने इन्द्र सहित समस्त देवताओं को पराजित करके त्रैलोक्य का राज्य प्राप्त किया है । इस वाक्य के पूरा होते ही आप बन्धन में पड़ जायेंगे ॥१५१॥ यह जो वामन हैं, वह साक्षात् विष्णु है । इसको आपको वैभव नही प्रदान करना चाहिए, इसीने आपके पिता को मारा था ॥१५२॥ यह आपके पिता माता तथा बान्धवों को मारने वाला है । यह आपके वंश का विनाश करने वाला है यह आपका भी विनाश कर देगा ॥१५३॥ यह धर्म को जानता ही नहीं है, केवल इन्द्र इत्यादि देवताओं का कल्याण करने में लगा रहता है । यह मायावी है, इसने माया से बड़े-बड़े दानवों को जीत लिया ॥१५४॥ यह माया से वामन ब्राह्मण का रूप बनाये हुए है । बहुत अधिक क्या कहना है ? इसको कुछ भी नहीं देना चाहिए ॥१५५॥ मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ, कि इसको यदि आपने मक्खी के पैर रखने भर भी भूमि दे दिया तो यह आपका विनाश कर देगा ॥१५६॥ अपने गुरु शुक्राचार्य के इस तरह से कहने पर वाष्कलि ने कहा-- आचार्य मैं धर्मार्थी हूँ । मैंने धर्मानुसार इसको इन सारी वस्तुओं को देने की प्रतिज्ञा की है ॥१५७॥ अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना सज्जनों का सनातन धर्म है । यदि ये स्वयं भगवान् विष्णु हैं, तो फिर आज मुझसे बढकर धन्य कोई नहीं है ।।१५८॥ हे गुरो ! यदि ये मुझसे दान लेकर उसे देवतओं को देना चाहते हैं तब तो भगवान् विष्णु ने ही मुझे धन्य बना दिया ॥१५९॥ योगिजन ध्यान करके ध्यान के द्वारा जिनका दर्शन करना चाहते हैं, फिर भी ये उनके ध्यान में नहीं आते हैं, उन्हीं भगवान् विष्णु का मैं आज साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ ॥१६०॥ दान करने वाले लोग अपने हाथ में कुश का जल लेकर दान देते समय कहते हैं, इस दान से सनातन परमात्मा विष्णु प्रसन्न हो जायँ, यह कहकर मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं । यहाँ पर दान करने का मेरा विकल्प भी मुक्ति प्राप्त करना ही है॥१६२॥ आपने मुझे बचपन में जो उपदेश दिया था उसको मैं अपने हदय में धारण किये हुए हूँ । आपने कहा था शत्रु के भी घर पर याचक के रूप में आने पर उसके लिए कुछ भी अदेय नहीं होना चाहिए ॥१६३॥ हे गुरो!

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know