Srishti Khanda Extracted Page 408

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-408

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Sanskrit Original

ममाग्निशरणार्थाय यत्र कुर्या मखं त्वहम् । तदस्य कारणं कृत्वा अर्थितैषा मम प्रभो ॥१२९॥ लोकत्रयं मेऽपहतं त्वया विक्रम्य बाष्कले । निर्वृत्तिको निर्धनोस्मि यदित्से न तदस्ति मे ॥१२२॥ भवंतं याचयिष्यामि परार्थेनापि चात्मना । अर्थित्त्वेन ममाप्यस्य यद्योग्यं तत्समाचर ॥१२३॥ जातोऽसि काश्यपे च त्वं वंशे वंशविवर्द्धनः । दित्यास्त््वं गर्भसंभूतः पिता त्रैलोकपूजितः ॥१२४॥ एवं भूतमहं ज्ञात्वा तेन त्वां याचयाम्यहम् । अस्याग्निशरणार्थाय दीयतां भू पदत्रयम् ॥१२५॥ अतीवह्वस्वगात्रस्य वामनस्यास्य दानव । भूमिभागे च पारक्ये दातुं नत्वहमुत्सहे ॥१२६॥ एतदेव मया दत्तं यद्धवानर्थितोऽसि में गुरवो यदि मन्यंते मंत्रिणो वा पदत्रयम् ॥९२७॥ अर्थित्वेन मदीयेन स्वकुले बांधवेपि च। गृहायाते मयि तथा यद्योग्यं तत्समाचर ॥१२८॥ यदिते रुचिते वीर दानवेंद्र महाद्युते । तदस्मैदीयतां शीघ्रं वामनाय महात्मने॥१२९॥ बाष्कलिरुवाच देवेंद्र स्वागतं तेस्तु स्वस्ति प्राप्नुहि माचिरम्। त्वं समीक्षस्वधात्मानं सर्वेषां च परायणम् ।१३०॥ त्वयि भारं समावेश्य सुखमास्ते पितामहः । ध्यानधारणया युक्तश्च॑ंतयानः परं पदम् ॥१३१॥ संग्रामै बहुभिः खिन्नो जगच्चितामपास्य तु । क्षीराब्धिद्वीपमाश्रित्यसुखं स्वपिति केशवः ॥१३२॥ अन्ये च दानवाः सर्वे बलिनः सायुधास्त्वया । असहायेनैव शक्र सर्वेऽपि विनिपातिताः ॥१३३॥ आदित्या द्वादशैवेह रुद्रास्त्वेकादशापि वा । अश्विनौ वसवश्चैव धर्मश्चैव सनातनः ॥९३४॥ के समान हैं ॥११९॥ यह ब्राह्मण कश्यप महर्षि के शुद्ध वंश में उत्पन्न हुआ है । इसने मुझसे प्रार्थना की कि मुझे तीन डग पृथिवी दे दीजिये ॥१२०॥ यह मेरी यज्ञशाला के लए आप दें । जहाँ पर में यज्ञ कर सकूँ । इसी के लिए में आपके पास अर्थी बन कर आया हूँ ॥१२१॥ हे वाष्कले ! आपने अपने पराक्रम के बल पर मुझसे त्रैलोक्य को छीन लिया है । मै तो निर्धन और निवृर्ति हूँ, अतएव मैं इसे नहीं दे पाया हूँ ॥१२२॥ अतएव दूसरे के लिए में अर्थी बनकर आपके समक्ष याचना कर रहा हूँ । आपके लिए जो योग्य हो वैसा आप करें ॥१२३॥ हे अपने वंश को बढाने वाले वाष्कलि आप भी महर्षि कश्यप के ही वंश में उत्पन्न हुए हें । आप दिति माता के गर्भ से उत्पन्न हैं और आपके पिता त्रैलोक्य में पूजित हैं ॥१२४॥ इसी प्रकार का आपको जानकर मैं आपसे याचना कर रहा हूँ । इसकी यज्ञशाला के लिए आप तीन डग पृथिवी इन्हें प्रदान करें ॥१२५॥ हे दानव ! अत्यन्त मन्द चलने वाले इस ब्राह्मण को दूसरे की पृथिवी को देने का मैं उत्साह नहीं कर पा रहा हूँ ॥१२६॥ मैंने इसके लिए इतना ही में दे रहा हूँ कि, में आपके यहाँ में याचना कर रहा हूँ यदि आपके गुरुजन तथा मन्त्रिजन इसको उचित समझते हों तो इसे तीन डग पृथिवी दे दीजिये ।। १२७॥ मेरे अर्थी होने पर भी अपने वंश तथा अपने बान्धव एवं मेरे विषय में आप जैसा उचित समझें वैसा करें ॥१२८॥ हे महाकान्ति ! सम्पन्न दानवेन्द्र ! यदि आपको अच्छा लगे तो शीघ्र ही आप इसे प्रदान कर दें ॥१२९॥ वाष्कलि ने कहा-- हे देवेन्द्र ! आपका स्वागत है । शीघ्र ही आप कल्याण प्राप्त करें आप सबों के आश्रयभूत अपने को तो देखिये ॥१३०॥ लोक पितामह अपना सारा भार आपको सौंप कर सुख पूर्वक शयन करते हैं और वे ध्यान तथा धारणा से युक्त होकर सर्वदा परंपद का चिन्तन करते हैं ॥१३१॥ अनेक संग्राम करने के कारण खिन्न बने हुए भगवान् केशव संसार की रक्षा की चिन्ता का त्याग करके क्षीरसागर में सुखपूर्वक शयन करते हैं ॥१३२॥ आपने दूसरे भी बलवान् तथा आयुध धारी दानवों को बिना किसी दूसरे सहायक के मार गिराया ॥ १३३॥ हे इन्द्र ! द्वादशादित्य, एकादश रुद्र, दोनो अश्विनी कुमार तथा सनातन धर्म ये सब के

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