Srishti Khanda Extracted Page 407

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-407

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Sanskrit Original

दारान् पुत्रांस्तथागारं त्रैलोक्ये का कथा मम । आगत्य संमुखं तस्य अंकमानीय सादरम् ॥१०७॥ परिष्वज्याभिनन्द्यैनं गृहं प्रावेशयत्स्वकम् । तस्य स्वागतमर्ध्याद्यैः कृत्वा पूजां प्रयत्मतः ॥१०८॥ अद्य मे सफलं जन्म पूर्णाः सर्वे मनोरथा: । यस्त्वां पश्यामि शक्राद्य स्वयमेव गृहागतम् ॥१०९॥ ख्याप्योऽहं दनुमुख्यानां देवराज त्वया कृतः । आगच्छता मम गृहं पुण्यता तु पराहि मे॥११०॥ अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञै स्सम्यगिष्टैस्तु यत्फलम् । तत् फलं समावाप्यैत त्त्वयि दृष्टे पुरंदर ॥१११॥यत्फलं भूमिदानेन गवां दानेन ऋत्विजे। ममाद्य तत् फलं भूतमथवा राजसूयकम्॥९९२॥ नाल्पेन तपसा लभ्यं दर्शनं तव वासव । एवं गेहे मया वत्ते प्रियं कार्य तदुच्यताम्॥९१३॥ विकल्पोन्यो न भवता हृदि कार्यः कथंचन। कृतं च तद्विजानीय यद्यदिस्यात्सुदुष्करम् ॥१९४॥ पुण्योऽहं पुण्यतां प्राप्तो दर्शनात्तव शत्रुहन् । यत्ते देववरैर्वद्यौ वंदितौ चरणौ मया॥१९५॥ किमागमनकृत्यं ते वद सर्व मयि प्रभो । अत्याश्चर्यमिदं मन्ये तवागमनकारणम्॥९९६॥ इंद्र उवाच जानेऽहं दनुमुख्यानां प्रधानं त्वां तु वाष्कले। नात्याश्चर्यमिदं भाति त्वयि दृष्टेऽ सुरोत्तम ॥१९७॥ विमुखा नार्थिनो यांति भवतो गृहमागताः। अर्थिनां कल्पवृक्षोसि दाता चान्यो न विद्यते॥१९८॥ प्रभायां सूर्यतुल्योसि गांभीर्ये सागरोपमः। सहिष्णुत्वे धरा चैव श्रिया नारायणोपमः ॥११९॥ ब्राह्मणः कश्यपकुले जातोयं वामनः शुभे । प्रार्थितोहमनेनैवं भूमेर्देहे पदत्रयम् ॥१२०॥ अर्थी बनकर ये मुझसे जो कुछ भी माँगेगे, वह मेरे घर आये हुए इनको में दूँगा, यहाँ तक कि अपने प्राणों को भी दे सकता हूँ । त्रैलोक्य की कौन सी बात है, ये पत्नी, पुत्र तथा मेरे गृह को भी माँगेंगे तो उसे भी मैं दूँगा । इसके बाद इन्द्र के समक्ष आकर आदर पूर्वक उनको अपने क्रोड में लेकर ॥१०६-१०७॥। वाष्कलि ने इन्द्र का आलिंगन किया और अपने घर ले गया और उसने स्वागत पूर्वक इन्द्र को अर्घ्य प्रदान करके पूजा किया ॥१०८॥ इसके बाद वाष्कलि ने कहा-- आज मेरा जन्म सफल हो गया, मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हो गये, क्योंकि आज आप स्वयम् मेरे घर आये हैं ॥१०९॥ हे देवराज ! आज आपने मुझे सभी दानवों में श्रेष्ठ बना दिया है । आप मेरे घर आकर आपने मेरे पुण्य को बढा दिया है ॥११०॥ अग्निष्टोम इत्यादि यज्ञो के द्वारा जिस फल की प्राप्ति होती हें, आपके आने से मुझे उसी फल की प्राप्ति हुयी है ॥१११॥ ऋत्विजों को भूमि दान करने अथवा गोदान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, अथवा राजसूय यज्ञ का जो फल होता है आज मुझे उसी फल की प्राप्ति हुयी है ॥११२॥ हे इन्द्र ! थोड़ी तपस्या के द्वार आपका दर्शन नहीं मिलता है, अतएव मेरे यहाँ आपका जो उत्तम कार्य हो उसे आप बतलायें।। ११३॥ आपको अपने मन में किसी दूसरे विकल्प को नहीं करना चाहिए । आपका वह कार्य अत्यन्त दुष्कर भी हो तो भी उसे आप पूरा हुआ ही समझिए ॥११५॥ हे शत्रुओं का विनाश करने वाले इन्द्र ! मैं पवित्र हुँ और मैं अधिक पुण्यवान हो गया हूँ, क्योंकि बड़े-बड़े देवताओं द्वार वन्दनीय आपके दोनों चरणों की मैंने बन्दना की है ॥११५॥ हे प्रभो ! आप बतलायें कि आपके आने का प्रयोजन क्या है ? मुझे तो सबसे बड़ा यही आश्चर्य कि आप मेरे यहाँ आये । इन्द्र नेकहा-- हे वाष्कले ! में आपको सभी दानवों में श्रेष्ठ मानता हूँ । हे असुरोत्तम ! यह कोई अत्यन्त आश्चर्य की बात नहीं है ॥११७॥ आपके घर आकर कोई भी याचक निराश होकर नहीं लोटता है । आप याचकों के लिए कल्पवृक्ष हैं, आपके समान कोई दाता नहीं है ॥११८॥ आप प्रभा (कान्ति) के विषय में सूर्य के समान हैं गाम्भीर्य के विषय में आप सागर के समान हैं । आप पृथिवी के समान सहिष्णु हें और लक्ष्मी के विषय में नारायण

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