Srishti Khanda Extracted Page 406
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-406
Sanskrit Original
वेदवेदांगतत्वज्ञो यज्ञयाजी तपोरतः। न चदुःशीलनिरतः स सर्वत्राविहिंसक: ॥९ २॥ मान्यमानयिता शुद्ध: सुमुखः पूज्यपूजकः। सर्वार्थविदनाधृष्यः सुभगः प्रियदर्शनः ॥९३॥ बहुधान्यो बहुधनो बहुयानश्च दानवः। त्रिवर्गसाधको नित्यं त्रैलोक्ये वरपूरुषः ॥९४॥ स्वपुरीनिलयो नित्यं देवदानवदर्पहा । स चैवं पालयामास त्रैलोक्ये सकला: प्रजाः ॥९५॥ नाधमः कश्चिदप्यास्ते तस्मिन् राजनि दानवे । दीनो वा व्याधितो वापि अल्पायुर्वाथ दुःखितः ॥९६॥ मूर्खो वा मंदरूपो वा दुर्भगो वानिराकृतः । एवं युतं तं विमलैगुणौधै दृष्ट्वा च मत्वा च निविष्टबुद्धिम् ॥९७॥ प्रसादयन् दैत्यवरं महात्मा पुरंदरस्तं तु दनुप्रधानम्। तेजोयुक्तं दानवं तं तपंतमिवभास्करम्॥९८॥ त्रैलोक्यधारणे शक्तं विस्मितः सोऽ भवत्तदा । इंद्रं पुरागतं दृष्ट्वा दानवेंद्राय पार्थिव ॥९९॥ इदमूचुस्तदा गत्वा दानवा युद्धदुर्मदाः । आश्चर्यमिति वै कृत्वा इंद्रोभ्येति पुरीं तव॥१००॥ एकाकी द्विजमुख्येन वामनेन सह प्रभो। अस्माभिर्यदनुष्ठेयं सांप्रतं नो वद स्वराट् ॥१०१॥ दानवानब्रवीत्सर्वान् पुरो तिष्ठत संकुलम् । प्रवेश्यतां देवराजः पूज्यः स तु ममाद्य वै ॥१०२॥ एतस्मिन्नेव काले तु वामनः स च वासवः । आगतौ दनुनाथेन प्रेम्णा चैवावलोकितौ ॥९०३॥ कृतार्थ मन्यतात्मानं प्रणिपातपुरः सरम् । उवाच वचनं राजा दानवानां धुरंधरः ॥१०४॥ अद्या वै त्रिषु लोकेषु नास्ति धन्यतरो मया । योऽहं श्रिया वृतः शक्रं पश्यामि गृहमागतम् ॥१०५॥ अर्थित्वकाम्यया यस्तु मामयं याचयिष्यति । गृहागतस्य तस्याहं दास्ये प्राणानपि ध्रुवम् ॥१०६॥ को करने वाला तथा तपस्या करता रहता था । वह दु:शील नहीं था, सर्वत्र वहअहिंसा का पालन करता था ॥९२॥ वह सम्माननीयों का सम्मान करने वाला, शुद्ध, सुन्दर मुख वाला तथा पूज्य पुरुषों की पूजा करने वाला था । वह सभी विषयों को जानने वाला, अनाधृष्य (किसी से पराजित नहीं होने वाला) तथा सुन्दर तथा देखने में अच्छा था॥९३।। उन दानव के पास बहुत अधिक धन, धान्य और विमान थे । वह सदा अपने त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) को सिद्ध करता था, वह त्रैलोक्य में श्रेष्ठ पुरुष था ॥९४।॥ वह सदा अपनी नगरी में ही रहता था तथा देवताओं और दानवों के दर्प को विनष्ट करने वाला था । वह इस प्रकार से त्रैलोक्य की सारी प्रजा का पालन करता था ॥९५॥ उस दानव के राज्य में कोई भी अधम पुरुष नहीं था । उसके राज्य में कोई दीन, रोगी, अल्पायु अथवा दुःखी, मूर्ख, मन्दरूप वाला, दुर्भाग्यग्रस्त अथवा अपमानित नहीं था । इस प्रकार के सुन्दर गुणों से युक्त वाष्कलि को देखकर तथा उसे निविष्ट बुद्धि मानकर ॥९६-९७॥ महात्मा इन्द्र सूर्य के समान तेजस्वी उस दानव को प्रसन्न करते हुए त्रैलोक्य के धारण करने में समर्थ उसे देखकर आश्चर्य चकित हो गये । आगे-आगे दानवेन्द्र के पास आते हुए इन्द्र को देखकर ॥९८-९९॥ युद्ध करने में दुर्मद दानव जाकर वाष्कलि से कहे कि बड़े आश्चर्य की बात है कि आपकी नगरी में इन्द्र आ रहे हैं ॥१००॥ वे अकेले हैं और उनके साथ एक वामन ब्राह्मण हैं । अतएव हमलोगों को क्या करना चाहिए ? इस बात का आप हमें शीघ्र आदेश दें ॥१० १॥ वाष्कलि अपनी नगरी में ही रहा और दानवों से कहा कि देवराज को मेरे पांस लाओ, वे मेरे पूज्य हैं ॥१०२॥ उसी समय वहाँ वामन भगवान् तथा इन्द्र दोनों आ गये और वाष्कलि ने उन दोनों को प्रेम पूर्वक देखा ॥१०३॥ वाष्कलि ने उन दोनों को प्रणाम किया और अपने को कृतार्थ माना । दानवों के धुरन्धर राजा वष्कलि ने कहा ॥१०४॥ आज त्रैलोक्य में मुझसे बढकर दूसरा कोई भी धन्य नहीं है; क्योंकि आज मैं अपने ऐश्वर्य से सम्पन्न इन्द्र को अपने घर पर आये हुए देख रहा हुँ।।१०५॥
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