Srishti Khanda Extracted Page 405
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-405
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण जगाम शक्रसहितो बाष्कलेश्व निवेशनम् । दूरादेव च तां दृष्ट्वा पुरीं तस्य समावृताम् ॥७८॥ पांडुरैः खगमागम्यैः सर्वरत्मोपशोभितैः । शोभितां भवतै मुख्यै स्सुविभक्तमहापथैः ॥७९॥ नित्यप्रभिन्नै मर्तिङ्गै रंजनाचलसन्निभैः । देवनागकुलोत्पन्नैः शतसंख्यै र्विराजिताम् ॥८ ०॥ निर्मासगात्रैस्तुरगै रल्पकणै र्मनोजवैः । दीर्घग्रीवाक्षिकूटैश्च मनोज्ञै रूपशोभिताम् ॥८ १॥ पद्मगर्भसुवर्णाभाः पूर्णचंद्रनिभाननाः। संल्लापोल्लापकुशला स्तत्र वेश्याः सहस्रशः ॥८ २॥ न तत्पुण्यं न सा विद्या न तच्छिल्पं न सा कला । वाष्कलेर्न पुरेऽस्याथ निवासं प्रतिगच्छति ॥८ ३॥ उद्यानशतसंबाधं समाजोत्सवमालिनी । अन्विते दनुमुख्यैश्च सर्वैरंतकवर्जितैः ॥८ ४॥ वीणावेणुमृदङ्गानां शब्दैः सर्वत्र नादिते। सदा प्रहृष्टा दनुजा बहुरत्नोपशोभिताः ॥८५॥ क्रीडमानाः प्रदृश्यंते मेराविव यथामराः । ब्रह्मघोषो महांस्तत्र दनुवृद्धैरूदीरितः ॥८६॥ साज्यधूमेन चाग्रीनां वायुना नष्टकिल्विषे । सुगंधधूपविक्षेपसुरभीकृतमारुते ॥८ ७॥ सुगंधिदनुजाकीर्णे पुरे तस्मिस्तु बाष्कलिः। त्रैलोक्यं तु वशे कृत्वा सुखेनास्ते सदा नवः॥८८॥ तत्रस्थः पालयन्ञास्ते त्रैलोक्यं सचराचरम् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवादी जितेंद्रियः ॥८९॥ सुदर्शः पूर्वदेवानां नयानयविचक्षणः । ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च दीनानामनुकंपकः ॥९०॥ वेदमनत्रप्रभूत्साहसर्वशक्तिसमन्वितः । षाड्गुण्यविषयोत्साहः स्मितपूर्वाभिभाषितः॥९ ९॥ कार्य करेंगे । इसतरह से जब देवतागण भक्तिपूर्वक सोच रहे थे, उसी समय भगवान् इन्द्र के साथ वाष्कलि के यहाँ गये । उन्होंने दूर से वाष्कलि की नगरी को देखा; वह परकोटे से घिरी हुयी थी ॥७७-७८॥। सभी प्रकार के स्वच्छ रत्नो से जटित भवन सुशोभित हो रहे थे, वहाँ के मार्ग विस्तृत थे ॥७९॥ आकाशचारी जीव भी वहाँ नहीं जा सकते थे ॥७९॥ वहाँ अञ्जनोपल पर्वत के समान विशाल और काले-काले असंख्य हाथी थे जो देवताओं के हाथियों के ही कुल में उत्पन्न थे ॥८ ०॥ घोड़े स्थूल शरीर वाले नहीं थे । वे मन के समान वेग वाले तथा छोटे-छोटे कान वाले थे। उनकी लम्बी गर्दन थी तथा वे अक्षिकुट के कारण सुशोभित होते थे । इसतरह के अश्रों से वह नगरी सुशोभित हो रही थी ॥८१॥ वहाँ पर कमल के बीच में विद्यमान के समान कान्ति वाली, तथा पूर्ण चन्द्रमा के समान आह्लादक मुखों वाली हजारों वारांगनाएँ थीं जो नृत्य सङ्गीत में कुशल थीं ॥८२॥ उस वाष्कलि के नगर में समस्त पुण्य, सभी विद्याएँ, समस्त शिल्प तथा समस्त कलायें विद्यमान थीं ॥८३॥ वहाँ अनेक उद्यान थे जहाँ सदैव उत्सव होते रहते थे, वहाँ बड़े-बड़े दानव रहते थे वे सब यमराज को जीत लेने वाले थे ॥८४॥ सर्वत्र वीणा, वेणु तथा मृदङ्ग की ध्वनि होती रहती थी, अनेक रत्नों से अलङ्कृत दानव वहाँ सदा प्रसन्न रहते थे ॥८५। जिस तरह सुमेरु पर्वत पर देवता क्रीडा करते रहते हैं उसीतरह दानव भी उस नगरी में क्रीडा करते रहते थे । वहाँ पर वृद्ध दानव सदा वेद पाठ करते रहते थे ॥८६॥ घृत युक्त धूप से अग्नियों के दोष को वायु के द्वारा अपाकृत कर दिए जाने के कारण सुगंधित धूप के पड़ते रहने से वायु वहाँ सुगन्धित रहती थी ॥८७॥ सुगन्धित दानवों से व्याप्त उस नगरी में रहकर वाष्कलि, त्रैलोक्य को अपने वश में करके दानवों के साथ सुखपूर्वक रहता था ॥८८॥ वहीं रहकर वह त्रैलोक्य का प्रशासन करता था । वह धर्मज्ञ, कृतज्ञ सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय था ॥८९॥ वह नीति और अनीति को अच्छी तरह जानता था, अतएव देवता भी उसे मिल सकते थे । वह ब्रह्मण्य (ब्राह्मणों का भक्त) शरणागत की रक्षा करने वाला तथा दीन जनों पर दया करने वाला था ॥९०॥ वह वेद मन्त्रों का ज्ञाता, उत्साह एवं शक्ति से सम्पन्न तथा षाड्गुण्य के विषय में उत्साह सम्पन्न वह मुस्कुराकर ही कुछ भी कहता था ॥९१॥ वह वेदों तथा वेदाङ्गों के तत्त्व को जानने वाला, यज्ञं
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