Srishti Khanda Extracted Page 403
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-403
Sanskrit Original
विमुच्यमाने गगने रजोभिः शनैश्शनै र्नश्यति चांधकारे । उदरांतर्गते विष्णौ द्रोहबुद्धिस्तदाभवत् ॥५३॥ तां निशामय राजेंद्र देवमातुर्यथाक्रमम् । किमनुक्रमणेनैव लंघयामि त्रिविष्टपम् ॥५४॥ बाष्कलिं दानवेंदरं तं कुर्या पातालवासिनम् । शक्रस्य तु मया दत्तं धनं लावण्यमेव च ॥५५॥ दानवानां विनाशाय एकैव प्रभवाम्यहम् । क्षिपामि शरजालानि चक्रयानान्यनेकशः ॥५६॥ गदाव्रातांश्च विविधान् दानवानां विनाशने । विबुधान् देवलोकस्थानधो भूमेस्तु दानवान् ॥५७॥ करोमि कालयोगेन तत्तु कार्य व्रतेन मे निस्सृता सहसा वाणी वक्त्रमेवाभिसंस्थिता ॥५८॥ येनेदं चिन्त्यते पूर्व यन्नदृष्टं न च श्रुतम् । बंधं वै दनुमुख्यस्य कृतं कोपेन पश्य मे ॥५९॥ कश्यपाय पुरा दत्तं धनं लावण्यमेव च। किमयं विगतोत्साहो वायवोथ समाकुलाः ॥६०॥ भ्रमतीव हि मे दृष्टिमैतद्रूपं प्रचितितम् । आविष्टा किमहं वच्मि केनाप्यसदृशं वचः ॥६१॥ विकल्पवशमापन्नाभीक्ष्णं हृदि ममर्श सा । दधार दिव्यं वर्षाणां सहस्त्रं दिव्यमीश्वरम् ॥६२॥ ततः समभवत्तस्यां वामनो भूतवामनः । जातेन येन चक्षूंषि दानवानां हतानि वै ॥६३॥ जातमात्रे ततस्तस्मिन् देवदेवे जनार्दने । नद्यः स्वच्छांबुवाहिन्यो ववौ गंधवहोनिलः ॥६४॥ कश्यपोऽपि सुखं लेभे तेन पुत्रेण भास्वता । सर्वेषां मानसोत्साहस्तरैलोक्यांतरवासिनाम्॥६ ५॥ संजातमात्रे तु ततो जनाधिप जनार्दने । स्वर्गलोके दुंदुभयो विनेदुस्तैश्च ताडिताः ॥६६॥ प्रयास के ही होने लगी ॥५१॥ हवा मंद-मंद चलती थी, पर्वतों पर वर्षा होती थी, सभी मार्ग स्पष्ट हो गये, सभी लोग सत्य बोलने लगे ॥५२। आकाश में धूलि नहीं रह गयी, धीरे-धीरे अंधकार नष्ट हो गया । जब भगवान् उदर में आये उस समय देवमाता अदिति के मन में द्रोह की बुद्धि उत्पन्न हो गयी ॥५३॥ हे राजेन्द्र ! उसे आप सुनें अदिति देवी सोचनें लगीं दैत्यों का अनुसरण करने से कौन सा लाभ है ? मैं तो स्वर्गलोक को भी पार कर सकती हुँ।५४। मै वाष्कलि नामक दानवेन्द्र को पाताल निवासी बना दूँ । इन्द्र को तो मैंने सौन्दर्य और धन प्रदान किया है । दानवों का विनाश करने में मैं अकेले समर्थ हुँ । मैं अनेक बाणों तथा चक्रों का प्रयोग कर देती हूँ ॥५७॥ दानवों के समूह का विनाश करने के लिए गदा समूह का प्रयोग कर देती हूँ । देवताओं को देवलोक में और दानवों को भूमि के नीचे कर देती हूँ ॥५७॥ इस कार्य को मैं समयानुसार करती ही हूँ । यह मेरा व्रत है मुख से निकली हुयी वाणी मुख में ही स्थित होती है ॥५८॥ जो इस तरह से अश्रुतपूर्व एवं अदृष्टपूर्व जिसके द्वारा सोचा जाता है मैं उस श्रेष्ठ दानवों को बन्धन गत कर देती हूँ ॥५९॥ मैने पूर्वकाल में कश्यप महर्षि को धन और लावण्य प्रदान किया, क्या कारण है कि ये उत्साह रहित हो गये हैं, और वायुगण व्याकुल हैं ॥६०॥ इस तरह से सोचने के कारण मेरी बुद्धि आन्त सी होने लगी है । मेरी दृष्टि क्रोधाविष्ट हो गयी है, किसी से मैं इस बात को क्या कहूँ ? विकल्प से युक्त वह निरन्तर अपने हृदय में सोचती रहीं । इसतरह से देवी अदिति ने देवताओं के हजार वर्षों तक गर्भ में ईश्वर को धारण किया ॥६२॥ उसके बाद अदिति देवी के गर्भ से वामन भगवान् का प्रादुर्भाव हुआ । उनके उत्पन्न होने मात्र से दैत्यों की आँखें मानों विनष्ट हो गयीं ॥६३॥ जिस समय देवताओं के भी आराध्य श्रीभगवान् का प्रादुर्भाव हुआ। उस समय नदियों में स्वच्छ जल प्रवाहित होने लगा और सुगन्धित हवा चलने लगी ॥६४॥ महर्षि-कश्यप भी उस प्रकाशमान पुत्र को प्राप्त करके प्रसन्न हो गये । त्रैलोक्य में रहने वाले समस्त जीवों के मन में उत्साह भर गया ॥६५॥ जिस समय जनाधिप जनार्दन श्रीभगवान् का प्रादुर्भाव हुआ उस समय स्वर्गलोक में दुन्दुभि और नगाड़े बजे ॥६६॥
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