Srishti Khanda Extracted Page 402

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-402

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Sanskrit Original

वामनोऽहं भविष्यामि दानवानां विनाशकः । मया सह ब्रजत्वेष वाष्कलेस्तु निवेशनम् ॥४०॥ तत्र गत्वा वरं त्वेष मदर्थे याचतामिमम्। वामनस्यास्य विध्रस्य भूमेराजन्यदत्रयम् ॥४१॥ प्रयच्छस्व महाभाग याच्ञैषा तु मया कृता। शक्रेणोक्तो दानवेंद्रो दद्यात्स्वमपि जीवितम् ॥४२॥ गृह्य प्रतिग्रहं तस्य दानवस्य पितामह । तं बध्वा च ततो यत्नात्कृत्वा पातालवासिनम्॥४३॥ सौकरं रूपमास्थाय वधार्थं च दुरात्मनः । भविष्यामि न संदेहो व्रज शक्र त्वरान्वितः ॥४४॥ विरराम तमुक्त्वैवमंतर्द्धानं गतश्च वै । अथकालांतरे विष्णावदिते गर्भतां गते ॥४५॥ निमित्तान्यतिघोराणि प्रादुर्भूतान्यनेकशः । समस्तजगदाधारे विष्णौ गर्भत्वमागते ॥४६॥ शोभनं हि तदाजातं निमित्तं चैवमूर्जितम्। मालतीकुसुमानां तु सुगंधः सुरभिर्ववौ ॥४७॥ अथ विहितविधानं कालमासाद्य देव स्त्रिदशगणहितार्थ सर्वभूतानुंकपी । विमलविरलकेशश्चंद्रशंखोदयश्री रदितितनयभावं देवदेवश्चकार ॥४८॥ अवतरति च विष्णौ सिद्धदेवासुराणा मनिमिषनयनानां विप्रसेदुर्मुखानि । अतिविरतरजोभि र्वायुभिः संवहद्धि दिनमपि च तदासीज्जन्मविष्णोः सुगर्भे ॥४९॥ अदिति रजनगर्भा सापि देवी प्रयांती नतजघनभरात्तामंदसंचाररम्या । अलसवदनखेदं पांडुभावं वहंती गुरुतरमवगाढं गर्भमेवोद्वहंती ॥५ ०॥ ततः प्रविष्टे खलुगर्भवासं नारायणे भूतभविष्ययोगात् । विना पदं प्राप्तमनोरथानि भूतानि सर्वाणि तदा नभूवुः ॥५१॥ समीरणो वाति च मंदमंदं पतत्सुबर्षेषु नगोद्धवेषु। विविक्तमारगेषु दिगंतरेषु जनेषु वै सत्यमुपागतेषु ॥५२॥ साथ वाष्कलि के घर चलें ॥४०॥ वहाँ जाकर ये वाष्कलि से वरदान माँगें कि हे राजन् ! इनके रहने के लिए आप इन्हें तीन डग एथिवी दे दीजिये । में आपसे प्रार्थना करता हूँ । इन्द्र के प्रार्थना करने पर वाष्कलि अपना प्राण भी दे सकता है ॥४२॥ हे ब्रह्माजी ! उससे दान लेकर मैं उस दानव को बाँधकर उसे पाताल लोक का निवासी बना दृंगा॥४३॥। उसके बाद उसका बध करने के लिए मैं वराह रूप धारण करूँगा । इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है । हे इन्द्र ! तुम शीघ्र चलो ॥४४॥ यह कहकर श्रीभगवान् चुप हो गये और अन्तर्धान हो गये, इसके बाद कुछ समय बीतने पर भगवान् विष्णु अदिति के गर्भ में आये ॥४५॥ उस समय अनेक प्रकार के अत्यन्त भयङ्कर शकुन हुए । सम्पूर्ण जगत् के आधार जब भगवान् विष्णु गर्भ में आये ॥४६॥ उस समथ अनेक सुन्दर शकुन होने लगे । हवा मालती के पुष्प की सुगन्धि लेकर प्रवाहित होने लगी ॥४७॥ इसके बाद विधानानुसार समय आ जाने पर देवताओं का कल्याण करने के लिए सभी जीवों पर कृपा करने वाले स्वच्छ एवं विरलकेश वाले चन्द्रमा एवं शङ्ख के समान ऐश्वर्य सम्पन्न श्रीभगवान् अदिति के पुत्र बन गये ॥४८॥ जिस समय भगवान् विष्णु का अवतार हुआ उस समय जिनके नेत्रों में पलक नहीं होता है उन सिद्धों और देवताओं का मुख प्रसन्न हो गया । विष्णु के सुन्दर गर्भ के समय हवा धूलि रहित चलने लगी और दिन स्वच्छ हो गया ॥४९॥ जिनके गर्भ में श्रीभगवान् विराजमान थे उन अदिति देवी के जङ्घे चलते समय झुक जाते थे, भार जन्य खेद के कारण वे धीरे-धीरे चलती थीं । उनका शरीर अलसाया हुआ पीत वर्ण का हो गया । वे अत्यधिक भार से दुक्त गर्भ का वहन किए रहती थीं ॥५०॥ जिस समय भगवान् गर्भ में आये उस समय भूत और भविष्य का संयोग हो जाने के कारण सभी जीवों के मनोरथों की पूर्ति बिना

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