Srishti Khanda Extracted Page 401

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-401

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Sanskrit Original

यथाख्यातं मया दृष्टं जगत् तत्स्थमवेक्ष्यताम्। निःस्वाध्याय वषद्कारं निवृत्तोत्सवमङ्गलम् ॥२८॥ त्यक्ताध्ययन संयोगं मुक्तवार्तापरिग्रहम्। दंडनीत्या परित्यक्तं श्वासमात्रावशेषितम्॥२९॥ जगदार्तिमपि प्राप्तं पुनः कष्टतरां दशाम्। एतावता हि कालेन वयं ग्लानिमुपागताः ॥३०॥ ब्रह्मोवाच जानामि बाष्कलिं तं तु वरदानाच्च गर्वितम्। अजेयं भवतां मन्ये विष्णुसाध्यो भविष्यति॥३९॥ निरुध्य संस्थितो ब्रह्मा भावं तत्वमयं तदा। समाधिस्थस्य तस्यैव ध्यानमात्राच्चतुर्भुजः॥३२॥ स्तोकेनैव हि कालेन चिंत्यमानः स्वयंभुवा । आजगाम मुहूर्तेन सर्वेषामेव पश्यताम् ॥३३॥ विष्णुरुवाच भो भो ब्रह्मन्निवर्त्तस्व ध्यानादस्मान्निवारितः । यदर्थमिष्यते ध्यानं सोहं त्वां समुपागतः ॥३४॥ ब्रह्मोवाच महाप्रसाद एषोऽत्र स्वामिनो हि प्रदर्शनम् । कस्यान्यस्य भवेच्चैषा चिन्ताया जगतः प्रभो ॥३५॥ ममैव तावदुत्पत्ति र्जगदर्थे विनिर्मिता । जगदेतत्त्वदर्थीयं तत्वतो नास्ति विस्मय: ॥३६॥ भवता पालनं कार्य संहरेद्रुद्र एव तु । एवं भूते जात्यस्मिन् शक्रस्यास्य महात्मनः ॥३७॥ हृतं राज्यं बाष्कलिना त्रैलोक्यं सचराचरम्। भृत्यस्य क्रियतां साह्यं मंत्रदानेन केशव॥३८॥ वासुदेव उवाच भवतो वरदानेन अवध्यः स तु सांप्रतम् । बुद्धिसाध्यः स वै कार्यो बंधनादिह दानवः ॥३९॥ बतलाने से तेज की वृद्धि होती है ॥२७॥ मैंने जो कुछ कहा है, संसार की वही स्थिति है, उसे आप देखें । संसार स्वाध्याय (वेद पाठ) वषट्कार तथा मङ्गलमय उत्सवों से रहित हो गया ॥२८॥ संसार में कोई पढता भी नहीं है, वार्ता (कृषि) भी समाप्त हो गयी हैं दण्ड और नीति से रहित संसार, किसी तरह श्वास मात्र ले रहा है ॥२९॥ इस समय कष्ट प्राप्त संसार अत्यन्त कष्ट प्राप्त हो गया है । इतने समय में हमलोग अत्यन्त दुःखी हो गये हैं ॥३०॥ ब्रह्माजी ने कहा-- में वरदान से अभिमानी हुए वाष्कलि को जानता हुँ । में समझता हूँ कि वह आपलोगों के लिए अवध्य है किन्तु भगवान् विष्णु के लिए तो वह अवध्य नहीं है ॥३१॥ उसी समय ब्रह्माजी भी सब ओर से अपने मन को समेट कर समाधिस्थ हो गये जिस समय वे ध्यान कर रहे थे उसी समय थोड़ी ही देर में चतुर्भुज ॥३२॥ रूप में भगवान् विष्णु भी वहाँ आ गये, सबों के सामने ही भगवान् मुहूर्त भर में वहाँ आ गये ॥३३॥ श्रीभगवान् ने कहा- हे ब्रह्मन् ! आप ध्यान करना बन्द कीजिए, आप जिस लिए ध्यान कर रहे हैं, वह करने के लिए मैं यहाँ आ गया हूँ ॥३४॥ ब्रह्माजी ने कहा-- हे स्वामिन् ! आपकी यह बहुत बड़ी कृपा है कि ध्यान करते ही आप आ गये ।हे प्रभो ! दूसरा कौन है जिसके चिन्तन करने मात्र से यह संसार उत्पन्न हो जाय ॥३५॥ आपने संसार का कल्याण करने के लिए मुझको उत्पन्न किया है । इस समय संसार आपकी कृपा चाहता है, अतएव आपको कोई विस्मय नहीं होना चाहिए ।।३६॥ आपको संसार की रक्षा करनी चाहिए, इसका संहार रुद्र करते हैं । संसार की इसी प्रकार की स्थिति है । इस समय महात्मा इन्द्र का राज्य वाष्कलि ने छिन'लिया है और त्रैलोक्य पर अधिकार कर लिया है । ये आपके दास हैं, इनको कोई उपाय बतलाकर आप इनकी सहायता करें ॥३७-३८॥ भगवान् वासुदेव ने कहा-- वाष्कलि इस समय आपसे वरदान प्राप्त करके अवध्य हो गया है । अतएव बुद्धि पूर्वक उसको वाँधकर अपने वश में किया जा सकता है ॥३९॥ दानवों का विनाश करने के लिए मैं वामन हो जाने वाला हूँ ।इन्द्र मेरे

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