Srishti Khanda Extracted Page 400
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-400
Sanskrit Original
परमार्ति ययौ शक्रो निराशो जीविते कृत:।स बाष्कलिदर्निवेंद्रो वध्योऽयं मम संयुगे ॥१४॥ ब्रह्माणो वरदानेन सर्वेषां तु दिवौकसाम् । तदहं ब्रह्मणो लोके वृतः सर्व दिवौकसैः ॥१५॥ ब्रजामि शरणं देवं गतिरन्या न विद्यते । एवं विचिंत्य देवेंद्रो वृतः सर्वैर्दिवौकसैः ॥१६॥ जगाम त्वरितो भीष्म यत्र देवः पितामहः । ब्रह्मणः स पदं प्राप्य वृतस्तैश्च दिवौकसैः ॥१७॥ अब्रवीत् जगतः कार्य प्राप्तामापदमुत्तमाम्। किं न जानासि वै देव यतो नो भयमागतम्॥१८॥ दैत्यैर्यदाहृतं सर्व वरदानाच्च ते प्रभो । कथितं वै मया सर्वं बाष्कलेश्च दुरात्मनः ॥१९॥ क्रियतां चाविलंबेन पिता त्वं न: पितामहः। तत्त्वं चिन्तय देवेश शांत्यर्थं जगतस्त्विह ॥२०॥ तेषां च पश्यतां किंचिच्छौतस्मार्तादिकाः क्रियाः । न प्रावर्तन्त हानिस्तु तै रस्माकं दिने दिने ॥२१॥ यथाहि प्राकृतः कश्चित्स्वार्थमुह्दिश्य भाषते । विज्ञाप्यसे तथा स्माभिर्निरस्तोपकृतैः सदा ॥२२॥ यद्येनोपकृतं यस्य सहस्त्रगुणितं पुनः। यो न तस्योपकाराय तत्करोति वृथामतिः ॥२३॥ तस्योपकारदग्धस्य निस्त्रपस्यासतः पुनः । नरकेष्वपि संवासस्तस्य दुष्कृतकारिणः॥२४॥ नैतावतैव साधुत्वं कृते यातु प्रतिक्रिया स्वार्थैकनिष्ठबुद्धीनामेतन्नापि प्रवर्तते ॥२५॥ यद्यस्य ना भवत्स्थानं जगतोह्यात्र दुःखदम् । शतघा हृदयं दीर्णं तन्न तृप्तिमुपागतम् ॥२६॥ तत्र वा यत्र गंतास्मि निमग्नानुद्धरस्व नः । उपाय कथनेनास्य येन तेजः प्रवर्तते ॥२७॥ परास्त करके, सभी दानव यज्ञों के भोक्ता बन बये । वे उस यज्ञ पर्वत पर ही निवास करते थे ॥१२॥ इस कार्य को सभी दानवों में बलवान् वाष्कलि ने किया । जब सचराचर त्रैलोक्य दानवों के अधीन हो गया. ॥१३॥ उस समय इन्द्र अत्यन्त आर्त होकर जीवन से निराश हो गये । उन्होंने सोचा युद्ध में दानवेन्द्र वाष्कलि ब्रह्माजी के वरदान के कारण सभी देवताओं के लिए अवध्य है, अतएव में सभी देवताओं के साथ ब्रह्माजी के लोक में ॥१४-१५॥ जाकर उनकी ही शरणागति करूँ अब दूसरा कोई भी उपाय नहीं है । इस तरह से सोचकर इन्द्र सभी देवताओं के साथ ॥१६॥ हे भीष्म ! ब्रह्माजी के लोक में गये । देवताओं के साथ ब्रह्माजी के लोक में जाकर वे ॥१७॥ ब्रह्माजी से जगत् के कार्य तथा आयी हुयी इस बहुत बड़ी विपत्ति को बतलाये । हे देव ! आप हमलोगों पर आयी हुयी विपत्ति के विषय में नहीं जानते हैं क्या ?॥१८॥ हे प्रभो ! आपके वरदान के प्रभाव से दैत्यों ने सब कुछ छिन लिया है । यह सब कुछ दुष्ट वाष्कलि ने ही किया है ॥१९॥ अतएव आप शीघ्र कोई ऐसा उपाय करें क्योंकि आप हमसबों के पितामह हें । अतएव हे देवेश ! जगत् की शान्ति के लिए आप कोई उपाय सोचें ॥२०॥ उन सबों के समक्ष कोई भी श्रौत अथवा स्मार्त क्रिया नहीं हो पाती है । वे प्रतिदिन हमलोगों की हानि करते रहते हें ॥२१॥ जिसतरह कोई अज्ञानी व्यक्ति अपने स्वार्थ को ही देखकर बोलता है उसी तरह हमलोग भी उन सबों के द्वारा अपकृत होकर कह रहे हैं। २२॥ जिसके द्वारा कोई भी उपकृत होता है, वह उसकी बड़ाई हजारों गुणा करता है, किन्तु जिससे जिसका उपकार नहीं होता है, उसकी दृष्टि में वह व्यर्थ होता है ।।२३॥ उसके द्वारा किए गये उपकार के तेज से दग्ध हुए, निर्लज्ज तथा दुष्ट का निवास नरकों में ही होता है ॥२४।। केवल प्रतिकार कर देना मात्र ही सज्जनता नहीं कहलाती है । किन्तु जिसकी बुद्धि सदा स्वार्थ परायण ही बनी रहती है वह उपकार के बदले में उपकार भी नहीं कर पाता है॥२५॥ इस जगत् में जो जिसका स्थान है, उसकी यदि प्राप्ति नहीं होती है तो उससे उसको ऐसा कष्ट होता है कि उसका हृदय शतधा विदीर्ण हो जाता है अतएव वह उसकी प्राप्ति के उपाय को नहीं जान पाता है ॥२६।। अतएव हमें जहाँ जाना चाहिए उसे आप हमें बतलाइये । हमलोग दुर्दशाग्रस्त हैं, आप हमारा उद्धार करें, क्योंकि उपाय के
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