Srishti Khanda Extracted Page 399
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-399
Sanskrit Original
तीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच यज्ञपर्वतमासाद्य विष्णुना प्रभविष्णुना । पदानि चेह दत्तानि किमर्थं पदपद्धतिः ॥१॥ कृता वै देवदेवेन तन्मे वद महामते । कतमो दानवस्तेन विष्णुना दमितोत्र वै॥२॥ कृत्वा वै पदविन्यासं तन्मे शंस महामुने । स्वलोके वसतिर्विष्णो वैंकुंठेस्य महात्मनः ॥३॥ स कथं मानुषे लोके पदन्यासं चकार ह। देवलोकेषु वै देव देवाः सेंद्रपुरोगमाः ॥४॥ तपसा महता ब्रह्मन् भक्ता ये सततं प्रभुम् । श्रीवराहस्य वसतिर्महलोके प्रकीर्तिता ॥५॥ नृसिंहस्य तथा प्रोक्ता जनलोके महात्मनः । त्रिविक्रमस्य वसतिस्तपोलोके प्रकीर्तिता ॥६॥ लोकानेतान्परित्यज्य कथं भूमौ पदद्वयम् । क्षेत्रे पैतामहे चास्म्पिष्करे यज्ञपर्वते ॥७॥ पदानि कृतवान् ब्रह्मन्विस्तरान्मम कीर्तय । श्रुतेन सर्वपापस्य नाशो वै भविता ध्रुवम् ॥८॥ पुलस्त्य उवाच सम्यक् पृच्छसि भोस्त्वं यत् संशृणु त्वं समाहितः । यथापूर्वं पदन्यासः कृतो देवेन विष्णुना ॥९॥ यज्ञपर्वतमासाद्य शिलापर्वतरोधसि। पुरा कृतयुगे भीष्म देवकार्यार्थसिद्धये॥९०॥ विष्णुना च कृतं पूर्वं पृथिव्यर्थे परंतप । त्रिदिवं सर्वमानीतं दानवैर्बलवत्तरैः॥ १ १॥ त्रैलोक्यं वशमानीय जित्वा देवान्सवासवान् । दानवा यज्ञभोक्तारस्तत्रासन् बलवत्तराः ॥१२॥ कृता बाष्कलिना सर्वे दानवेन बलीयसा। एवं भूते तदालोके त्रैलोक्ये सचराचरे ॥१३॥ वामनावतार चरित्र वर्णन, वामन का शक्र के साथ वाष्कलि की नगरी में जाना, वामन के द्वारा तीन पगभूमि की याचना, वामन द्वारा वाष्कलि की प्रवंचना भीष्मजी ने कहा-- भगवान् विष्णु ने यज्ञपर्वत पर चढकर उस पर अपने पैरों को क्यों रखा ? उन पदचिह्नों का क्या प्रयोजन है ?॥१॥ देवाराध्य श्रीभगवान् ने पद्चिह् क्यों किया हे महामते ! उसे आप मुझे बतलायें। यहाँ पर उन्होंने किस दानव का दमन अपने पदविन्यास (पद चिह्न) के द्वारा किया ? हे महामुने ! उसे आप बतलायें भगवान् विष्णु का निवास तो वैकुण्ठ नामक स्वर्गलोक में है ॥३॥ उन्होंने इस मनुष्य लोक में किसलिए अपने पैरों को रखा । इन्द्र इत्यादि देवता बड़े-बड़े देवलोक में रहते हैं । तथा जो भक्तगण निरन्तर बहुत बड़ी तपस्या के द्वारा श्रीभगवान् की आराधना करते हैं, वे भी वैकुण्ठ लोक में रहते हैं । श्रीवराह भगवान् का निवास महलोक में बतलाया गया है ॥४-५॥ नृसिंह भगवान् का निवास जनलोक में बतलाया गया है तथा त्रिविक्रम भगवान् का निवास तपोलोक में कहा गया है ॥६॥ इन समस्त लोकों का परित्याग करके श्रीभगवान् भूमि पर ब्रह्माजी के क्षेत्र में यज्ञपर्वत के ऊपर क्यों गये 2॥७॥ हे ब्रह्मन् ! जिस कारण से अपने पैरों को रखे उसे आप मुझे विस्तार से बतलाइये । यह निश्चित है कि इसका श्रवण करने से पापों का नाश हो जायेगा ।।८।। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- आपने बहुत अच्छा प्रश्न किया उसे आप सावधानी पूर्वक सुनें, जिस तरह से पूर्वकाल में भगवान् ने पदन्यास किया था उसे मैं बतलाता हूँ ॥९॥ हे परंतप भीष्म ! पूर्वकाल में सत्ययुग में देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिएभगवान् विष्णु ने यज्ञ पर्वत पर आकर शिला पर्वत के तट में पृथिवी को प्राप्त करने के लिए तपस्या किया । वही पर अधिक बलवान् दानवों ने सम्पूर्ण स्वर्ग लोक को ला दिया ॥११॥ उन सबों ने इन्द्र सहित समस्त देवताओं को
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