Srishti Khanda Extracted Page 398
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-398
Sanskrit Original
अन्यान्यपि यथाशक्ति मिथुनान्यंबरादिभिः । धान्यालङ्कारगोदानैरन्यैश्च धनसञ्चयैः ॥४९॥ वित्तशाठ्येन रहितः पूजयेद्नतविस्मयः । एवं करोति यः सम्यक् सौभाग्यशयनव्रतम् ॥५ ०॥ सर्वन्कामानवाप्रोति पदं वा नित्यमश्नुते । फलस्यैकस्य च त्यागमेतत्कुर्वन्समाचरेत् ॥५१॥ यशः कोीर्तिमवाप्रोति प्रतिमासं नराधिप। सौभाग्यारोग्यरूपैश्च वस्त्रालंकार भूषणैः ॥५ २॥ नवियुक्तो भवेद्राजन् सौभाग्यशयनप्रदः । यस्तु द्वादश वर्षाणि सौभाग्यशयनव्रतम् ॥५३॥ करोति सप्तचाष्टौ वा ब्रह्मलोके महीयते । पूज्यमानो वसेत्सम्यक् यावत्कल्पायुतं नरः ॥५४॥ विष्णोर्लोकमथासाद्य शिवलोकगतस्तथा । नारी वां कुरुते या तु कुमारी वा नरेश्वर ॥५५॥ सापि तत्फलमाप्रोति देव्यनुग्रहलालिता। शृणुयादपि यश्चैव प्रदद्यादथवा मतिम्॥५६॥ सोपि विद्याधरो भूत्वा स्वर्गलोके चिरं वसेत्। इदमिह मदनेन पूर्वसृष्टं शतधनुषा च कृतं नरेण तद्वत्।५ ७॥ कृतमथ पवनेननंदिना च किमु जननाथ महाद्भुतं न वा स्यात् ॥५८॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे त्रताध्यायो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥२९॥ ke ब्रह्माजी तथा सावित्री देवी इन सबों की पूजा करे ऐसा करने वाला मनुष्य अपने समस्त अभिलषित पदार्थो को प्राप्त कर लेता है ॥४८॥ अपनी शक्ति के अनुसार अन्य दम्पततियों को भी वस्र, अन्न, अलङ्कार, गोदान तथा दूसरे प्रकार की धन सम्पत्ति के द्वारा पूजा करे ॥४९॥ इस पूजन में बिना किसी विस्मय के वित्त की शठता न करे । इस तरह से जो कोई भी सौभागय शयन त्रत करता है ॥५०॥ वह अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है, यदि निष्काम भाव से इस व्रत को करे तो फिर मुक्ति मिल जाती है । इस व्रत को करते समय किसी एक फल का परित्याग करे । ऐसा करने वाला प्रत्येक मास में यश को प्राप्त करता है । सौभाग्य, आरोग्य, रूप वस्त्र अलङ्कार तथा भूषण ॥५२॥ सौभाग्यशयन का दान करने वाला व्यक्ति इन सबों से रहित कभी नहीं रहता है । जो व्यक्ति बारह वर्षो तक सौभाग्यशयन व्रत करता है अथवा सात-आठ बार इस ब्रत को करता है वह ब्रह्मलोक में पूजित होता है और देवताओं से पूजित होता हुआ वह ब्रह्माजी के लोक में दश हजार कल्पों तक निवास करता है ।।५३-५४॥ उसके बाद वह भगवान् विष्णु के लोक में तथा शिवजी के लोक में जाता है हे राजन् ! यदि इस व्रत को कोई नारी अथवा कुमारी करती है तो ॥५५॥ वह भी देवीजी की कृपा से उस फल को प्राप्त करती है । जो इस व्रत का श्रवण करता है, अथवा दूसरों को करने की प्रेरणा देता है ॥५६॥ वह भी विद्याधर होकर दीर्घकाल तक स्वर्ग लोक में निवास करता है । इस ब्रत को पूर्वकाल में कामदेव ने, राजा शतधन्वा ने, वरुणदेव ने, भगवान् सूर्य ने तथा धनाधिपति कुबेर ने किया था ॥५८॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के उनतीसवें व्रताध्याय नामक अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २९।। re
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