Srishti Khanda Extracted Page 397

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-397

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Sanskrit Original

प्रीयताम्मे$ त्रललिता ब्राह्मणाय निवेदयेत्। एवं संवत्सरं यावत्तृतीयायां सदा नृप॥३४॥ प्राशने दानमंत्रे च विशेषोऽयं निबोध मे । गोशृंगाबुमधौ प्रोक्तं वैशाखे गोमयं पुनः ॥३५॥ ज्येष्ठे मंदारकुसुमं बिल्वपत्रं शुचौ स्मृतम् । श्रावणे दधिसंप्राश्यं नभस्ये तु कुशोदकम् ॥३६॥ क्षीरं चाश्वयुजे मासि कार्तिके पृषदाज्यकम्। मार्गशीर्षे तु गोमूत्रं पौषे संप्राशयेद् घृतम् ॥३७॥ माघे कृष्णतिलांस्तद्वत् पंचगव्यं च फाल्गुने। ललिता विजया भद्रा भवानी कुमुदा शिवा ॥३८॥ वासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमला सती । उमा च दानकाले तु प्रीयतामिति कीर्त्तयेत् ॥३९॥ तस्मिस्तु द्वादशे मासि द्वादश्यां कृष्णमर्चयेत् । तथा लक्ष्मीं च तत्रैव भर्त्रा सार्धमथार्चयेत् ॥४०॥ पौर्णमास्यामतस्त्ृत्सपत्मीकः पितामह: । उपासनीयो विदुषा परत्राभीतिमिच्छता ॥४१॥ सौभाग्याष्टकं तद्वच्च दातव्यं भूतिमिच्छता। मल्लिकाशोककमलं कदंबोत्पलचंपकम् ॥४२॥ कुब्जकं करवीरं च बाणमम्लानपंकजम् । सिंदुवारं च सर्वेषु मासेषु कुसुमं स्मृतम् ॥४३॥ जपाकुसुम्भकुसुमं मालती शतपत्रिका। यथालाभं प्रशस्तानि करवीरं च सर्वदा॥४४॥ एवं संवत्सरं यावदुपोष्य विधिवन्नरः । स्त्री च नक्तं कुमारी च शिवमभ्यर्च्य भक्तितः॥४५॥ ब्रतांते शयनं दद्यात्सवोपस्करसंयुतम् । उमामहेश्वरौ हैमौ वृषभं च गवा सह ॥४६॥ स्थापयित्वा च शयनं ब्राह्मणाय निवेदयेत् । द्वादश्यां वत्सरं त्वेकं महालक्ष्म्या च केशवम्॥४७॥ ब्रह्माणं सह सावित्र्या पूजयित्वा नरस्त्विह । सर्वान्कामानवाप्रोति मनसा समभीप्सितान्॥४८॥ होकर ॥३२॥ द्विजदम्पती की माला, वस्र तथा भूषण से पूजा करे, सौभागय अष्टक के साथ दोनों सुवर्ण प्रतिमा को उन्हें निवेदित कर दे ॥३३॥ उस समय ललिता देवी मुझ पर प्रसन्न हों (ललिता मे प्रीयताम्) का उच्चारण करे । हे राजन् भीष्म ! इस तरह एक वर्ष तक प्रत्येक शुक्ल तृतीया को ॥३४॥ व्रत करे भोजन और दान के विषय में विशेषता यह है कि रात्रि में चैत्र मास में गौ के शृंग का जल पीकर, वैशाख मास में गोमय चाट कर ॥३५॥ ज्येष्ठ मास में मन्दार पुष्प चाटकर, आषाढ मास में विल्वपत्र खाकर, श्रावण में दही, भाद्रपद में कुशोदक पीकर ॥३६॥ आश्विन में दुग्ध पीकर तथा कार्तिक के महीने में पृषदाज्य (दधि मिश्रित घी) मार्गशीर्ष में गोमूत्र पीकर, पौष मास में घी खाकर ।।३७॥।। माघ में काली तिल खाकर तथा फाल्गुन में पञ्चगव्य पीकर, भूमि पर सोये । प्रत्येक मास में दान देते समय क्रमशः इन नामों का उच्चारण करे ललिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, शिवा ॥३८॥ वासुदेवी, गौरी, मङ्गला, कमला, सती तथा उमा । जैसे चैत्र के ब्रत के अन्त में ललिता प्रीयतम् वैशाख में विजया प्रीयताम् इत्यादि ॥३९॥ बारहवें महीने में द्वादशी तिथि को भगवान् विष्णु और लक्ष्मी की पूजा करे । दोनों की पूजा एक साथ करे ॥४०॥ पूर्णिमा के दिन परलोक में अभय प्राप्ति चाहने वाले को सावित्री देवी के साथ ब्रह्माजी की पूजा करनी चाहिए ॥४१॥ और पूर्ववत् सौभाग्याष्टक का दान ब्राह्मण दम्पत्ती को देना चाहिये । मल्लिका (मालती) अशोक, कमल, नील कमल, चम्पा, कुब्जक, करवीर, बाण, विना कुम्हलाया हुआ कमल, सिन्दुवार इन पुष्पों को सभी मासों में चढाये ॥४३-४३॥ जपाकुसुम (ओड़हुल) कुसुम्भ कुसुम, मालती तथा शतपत्रिका इनमें से जो भी पुष्प मिले उसे चढाना चाहिए । करवीर को तो सदा चढाना चाहिए ॥४४।। इस तरह वर्ष पर्यन्त व्रत करके पुरुष, स्त्री तथा कुमारी को रात्रि में शिवजी की विधिवत् भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए ॥४५॥ ब्रत के समाप्त होने पर सभी आवश्यक सामग्री के साथ शय्या दान करे । उस शय्या पर सुवर्ण निर्मित उमा तथा महेश्वर की मूर्ति को रखकर, गौ तथा वृषभ के साथ ब्राह्मण को दान दे । उसके बाद एक वर्ष तक द्वादशी तिथि कों लक्ष्मी नारायण ॥४६-४७॥ || म

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