Srishti Khanda Extracted Page 395
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-395
Sanskrit Original
पिंगाकारासमुद्धूता वह्िज्वालातिभीषणा । तयाभितप्तस्य हरे वक्षसस्तद्विनि: सृतम् ॥५॥ यद्दक्षः स्थलमाश्रित्य विष्णोः सौभाग्यमास्थितम्। रसरूपं न तद्यावदाप्रोतिवसुधातले॥६॥ उत्क्षिप्तमन्तरिक्षात्तु ब्रह्मपुत्रेण धीमता । दक्षेण पीतमात्रं तद्रूपलावण्यकारकम् ॥७॥ बलं तेजो महज्जातं दक्षस्य परमेष्ठिनः । शेषं यदपतद्धूमावष्टधा तद्व्यजायत ॥८॥ ततस्त्वोषधयो जाताः सप्त सौभाग्यदायिकाः। इक्षवस्तरुराजश्च निष्पावाश्शालिधान्यकम् ॥९॥ विकारवच्च गोक्षीरं कुसुंभं कुसुमं तथा । लवणं चाष्टमं तद्दत्सौभाग्याष्टकमुच्यते ॥१०॥ पीतं यद्वह्मपुत्रेण योगज्ञानविदा पुरा । दुहिता सा भवत्तस्माद्यासतीत्यभिधीयते॥११॥ लोकानतीत्यलालित्याल्ललिता तेन चोच्यते । त्रैलोक्यसुदरीं देवीमुपयेमे पिनाकधृत् ॥१२॥ त्रिविश्वसौभाग्यमयीं भुक्तिमुक्तिफलप्रदाम् । तामाराध्य पुमान्भक्तया नारी वा किं न विंदति॥१३॥ भीष्म उवाच कथमाराधनं तस्या ललिताया मुने वद । यद्विधानं च जगतः शांतये तद्ददस्व मे ॥१४॥ पुलस्त्य उवाच वसंतमासमासाद्य तृतीयायां जनप्रियः । शुक्लपक्षस्य पूर्वाह्ने तिलैः स्नानं समाचरेत् ॥१५॥ तस्मिन्नहनि सा देवी किल विश्वात्मना सती । पाणिग्रहणिकैमत्र रुदूढा वरवर्णिनी ॥१६॥ तया सहैव विश्वेशं तृतीयायामथार्चयेत् । फलै ननिाविधेै दापि र्धूपै नैवेद्यसंयुतैः ॥९७॥ प्रतिमां पंचगव्येन तथा गंधोदकेन च । स्नापयित्वार्चयेद्रौरीमिंदुशेखरसंयुताम् ॥१८॥ हो गयी ॥४।। उसी समय अत्यन्त भयङ्कर पीले रङ्ग की ज्योति प्रकट हुयी । उसके द्वारा संतप्त होकर सौभाग्य द्रव रूप से भगवान् विष्णु के हृदय से प्रवाहित होकर पृथिवी पर गिरने लगा । जब तक वह सौभाग्य द्रव पृथिवी नहीं गिर पाया था ॥५-६।। उसी समय अन्तरिक्ष से गिरने वाले उसको ब्रह्माजी के बुद्धिमान पुत्र दक्ष ने पी लिया । जो रूप और तेज को उत्पन्न करने वाला था ॥७॥ उसके कारण दक्ष प्रजापति का रूप और बल बहुत अधिक बढ गया। दक्ष के पीने से बचकर जो सौभाग्य पृथिवी पर गिरा उससे आठ औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं ॥८॥ वे औषधियाँ सात प्रकार के सौभाग्य को प्रदान करने वाली बन गयीं । वे औषधियाँ हैं ईख, तरुराज, निष्पावा (मटर) शालि (अगहनीधान) विकार युक्त गोखुर, कुसुम्भ, कुसुम और नमक । ये आठो सौभाग्याष्टक कहलाती हैं ॥९-१०॥ योग ज्ञान को जानने वाले दक्ष ने जो उसे पी लिया, उससे दक्ष की सती नाम की पुत्री उत्पन्न हुयी ॥११॥ उसका सौन्दर्य अतिलौकिक था । अतएव उसका नाम ललिता भी हो गया । उस त्रैलोक्य सुन्दरी से पिनाकधारी शङ्करजी ने विवाह किया ॥१२॥ ललिता देवी त्रैलोक्य के सौभाग्य से युक्त हैं तथा भोग एवं मोक्ष रूपी फल को प्रदान करने वाली हैं। उन देवी की आराधना करके कोई भी स्त्री अथवा पुरुष समस्त अभिलषित पदार्थो को प्राप्त कर लेता है ॥१३॥ भीष्मजी ने कहा-- हे मुने ! आप यह बतलायें कि उन ललिता देवी की आराधना कैसे की जाती है ? उसको आप जगत् का कल्याण करने के लिए मुझे बतलाइये ॥१४॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- वसन्त ऋतु के चैत्र शुक्ल तृतीया को पूर्वाहण में तिलमिश्रित जल से स्नान करे ॥१५॥ इसी दिन सती देवी का विश्वात्मा भगवान् शङ्कर के साथ वैवाहिक मंत्रो द्वारा विवाह हुआ था ॥१६॥ ललिता देवी के साथ भगवान् शङ्कर की अर्चना तृतीया तिथि को ही करे । अनेक प्रकार के फलों, दीपों, धूपों तथा नैवेद्य को निवेदित करे ॥१७॥ उन दोनों की सुवर्ण निर्मित प्रतिमा को पञ्चगव्य तथा चन्दनोदक से स्नान कराये फिर शङ्करजी के साथ गौरी देवी की अर्चना करे ॥१८॥ पार्वतीदेव्यै
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