Srishti Khanda Extracted Page 394

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-394

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Sanskrit Original

श्रीवृक्षे शंकरो देवः पाटलायां तु पार्वती । शिंशपायामप्सरसः कुंदे गंधर्वसत्तमाः ॥२८॥ तिंतिडीके दासवर्गा वंजुले दस्यवस्तथा। पुण्यप्रद: श्रीप्रदश्च चंदन: पनसस्तथा॥२९॥ सौभाग्यदश्चंपकश्च करीरः पारदारिकः । अपत्य नाशकस्तालो वकुलः कुलवर्द्धन: ॥३०॥ बहुभार्या नारिकेलाद्राक्षा सर्वागसुंदरी। रतिप्रदा तथाकोली केतकी शत्रुनाशिनी ॥३९॥ एवमादि नगाश्चान्ये येनोक्तास्तेपि दायकाः । प्रतिष्ठांते गमिष्यंति यैस्तु वृक्षाः प्ररोपिता: ॥३२॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे वृक्षारोपणविधिर्नाम अष्टाविंशोध्यायः ॥२८॥ Ye उनतीसवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच तथैवान्यत्प्रवक्ष्यामि सर्वकामफलप्रदम् । सौभाग्यशयनं नाम यत्पुराणविदो विदुः॥१॥ पुरादग्धेषु लोकेषु भूर्भुवः स्वर्महादिषु । सौभाग्यं सर्वभूतानामेकस्थमभवत्तदा ॥२॥ बैकुंठं सर्वमासाद्यविष्णोर्वक्षस्थले स्थितम् । ततः कालेन कियता पुनः सर्वविधौ नृपः ॥३॥ अहङ्कारावृते लोके प्रधानपुरुषान्विते । स्पर्दायां च प्रवृद्धायां कमलासनकृष्णयोः ॥४॥ बढता है । निम्ब का वृक्ष लगाने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं ॥२७॥ विल्व का वृक्ष लगाने से भगवान् शङ्कर प्रसन्न | होते हैं । गुलाब के पेड़ में पार्वतीजी का निवास होता है । अशोक के वृक्ष में अप्सराओं का निवास होता है । कुन्द में श्रेष्ठ गन्धर्वो का निवास होता है ॥२८॥ इमली के वृक्ष में दासों का समूह रहता है और वेंत में लुटेरों का निवास होता हे । चन्दन का वृक्ष लगाने से पुण्य होता है कटहल का वृक्ष लगाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ॥२९॥ चम्पा का वृक्ष सौभाग्यप्रद होता हे । ताड़ का वृक्ष सन्तान का नाश करता है । करीर का वृक्ष दारिद्र्य देता है । बकुल (मोलश्री) के वृक्ष से सन्तान की वृद्धि होती है ॥३०॥ नारियल का पेड़ लगाने वाला अनेक पत्नियों का पति होता हे । दाख लगाने से सर्वाङ्गसुन्दरी नारी की प्राप्ति होती है । कोली का वृक्ष रति प्रदान करने वाला होता है और केवड़ा शत्रुओं का नाश करता है ॥३१॥ इसी तरह अन्य वृक्ष जिनको यहाँ नहीं कहा गया है, वे भी फल प्रदान करने वाले होते हैं । वृक्ष लगाने वालों की परलोक में प्रतिष्ठा होती है ॥३२॥ इस तरह श्रीपदमहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के वृक्षारोपणविधि वर्णन नामक अठाइसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २८।। —— सौभाग्यशयनव्रत का विधान, सौभाग्याष्टकोत्पत्ति वर्णन, कलिसाधन विधि वर्णन पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- राजन् मैं एक दूसरा सभी प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाला व्रत बतलाता हूँ । इस् व्रत का नाम सौभाग्यशयन है । इसे पुराणवेत्ता ही जानते हैं ॥१॥ प्रांचीनकाल में जब भू:भुव:, स्व: तथा महलेंक इत्यादि लोक दग्ध हो गये उस समय सभी प्राणियों में रहने वाला सौभाग्य एकत्रित हुआ ॥२॥ वह वैकुण्ठ में जाकर भगवान् विष्णु के वक्षस्थल में स्थित हो गया । उसके पश्चात् सृष्टि काल के आ जाने पर ॥३॥ प्रधान तथापुरुष से युक्त लोक अहङ्कार से आवृत हो गया । उस समय ब्रह्माजी तथा भगवान् विष्णु में परस्पर में स्पर्धा उत्पन्न >"

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