Srishti Khanda Extracted Page 393
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-393
Sanskrit Original
गोभिर्विभवतः सर्वानृत्विजः ससमाहितान् । हेमसूत्रैः सकटकैरंगुलीयैः पवित्रकैः ॥९४॥ वासोभिः शयनीयैश्च तथोपस्करपादुकैः । क्षीराभिषेचनं कुर्याद्यादद्दिनचतुष्टयम् ॥१५॥ होमश्च सर्पिषा कार्यो यवैः कृष्णतिलैरपि । पलाशसमिधः शस्ताश्चतुर्थेऽह्लि तथोत्सवः ॥१६॥ दक्षिणा च पुनस्तद्दद्देया तत्रापि शक्तितः । यद्यदिष्टतमं किंचित्तत्तद्दद्यादमत्सरी ॥९७॥ आचार्ये द्विगुणं दत्त्वा प्रणिपत्य क्षमापयेत् । अनेन विधिना यस्तु कुर्यादवृक्षोत्सवं बुधः ॥१८॥ सर्वान् कामानवाप्रोति पदं चानन्तमश्रुते। यश्चैवमपि राजेन्द्र वृक्षं संस्थापयेद्बुधः ॥१९॥ सोपि स्वर्गे वसेद्राजन्यावदिंद्रायुतत्रयम्। भूतान्भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद्रोमसंमितान् ॥२०॥ परमां सिद्धिमाप्रोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम्। य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद्वापि मानवः ॥२९॥ सोपि संपूज्यते देवै ब्रह्मलोके महीयते। अपुत्रस्य च पुत्रित्वं पादपा एव कुर्वते॥२२॥ तीर्थेषु - पिंडदानादीन् रोपकाणां ददंति ते यत्नेनापि च राजेंद्र अश्वत्थारोपणं कुरु॥२३॥ स ते पुत्रसहस्त्रस्य कृत्यमेकः करिष्यति । धनी चाश्वत्थवृक्षेण अशोकः शोकनाशनः ॥२४॥ प्लक्षो यज्ञप्रदः प्रोक्तः क्षीरीचायुः प्रदः स्मृतः । जंबुकी कन्यकादात्री भार्यादा दाडिमी तथा॥२५॥ अश्वत्थो रोगनाशाय पलाशो ब्रह्मदस्तथा । प्रेतत्वं जायते पुंसो रोपयेद्यो विभीतकम् ॥२६॥ अंकोले कुलवृद्धिस्तु खादिरेणाप्यरोगिता । निंबप्ररोहकाणां तु नित्यं तुष्येहिवाकरः ॥२७॥ चारो ओर ॥१२॥ उन्हीं कलशों के जलों से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को स्नपन (अभिषेक) करना चाहिए । उसके बाद यजमान स्नान करके तथा श्वेतवस्त्र धारण करके ॥१३॥ अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को, समाहित ऋत्विजों की पूजा करे और ब्राह्मणें को सोने की जंजीर, कड़ा, अड्भृठी तथा पवित्रक प्रदान करें ॥१४॥ वस्त्र, सभी सामग्री के साथ शय्या, पादुका (खड़ाऊं) प्रदान करें । उसके बाद चार दिनों तक, दुग्ध से वृक्षों का अभिषेक करें ॥१५॥ इस कार्य में घी, यव तथा तिल से होम करे । होम में समिधा पालाश की श्रेष्ठ है । चौथे दिन उत्सव मनाये ॥१६॥ उसके वाद पहले के ही समान दक्षिणा अपनी शक्ति के अनुसार देनी चाहिए । बिना किसी द्वेष के जो-जो वस्तुएँ अपने को अच्छी लगती हों उन्हीं वस्तुएँ का दान करे ॥१७॥ आचार्य को दो गुनी दक्षिणा देकर नमस्कार करके क्षमा प्रार्थना करे । जो विद्वान् इस प्रकार से वृक्ष का उत्सव मनाता है ॥१८॥ वह समस्त अभिलषित वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है तथा अनंत पद को प्राप्त करता है, हे राजेन्द्र ! जो विद्वान ऐसे भी वृक्ष का रोपण करता है ॥१९॥ वह भी जब तक तीस इन्द्र होते हैं तब तक स्वर्गलोक में निवास करता है और अपने शरीर में विद्यमान रोमों की संख्या के बराबर अपने अतीत एवं अनागत पितरों का उद्धार करता है ॥२०॥ वह पुनरावृत्ति रहित मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, जो मनुष्य इस प्रसङ्ग को पढता या सुनता है ॥२१॥ वह भी देवताओं से पूजित होकर ब्रह्मलोक में सुशोभित होता है पादपारोपण करने से सन्तानहीन सन्तान वाला हो जाता है ॥२२॥ वे वृक्षाभिमानी देवता तीर्थो में जाकर वृक्षारोपण करने वाले के लिए पिण्डदान करते हैं । अतएव हे राजेन्द्र ! यत्मपूर्वक आप पिप्पल का वृक्ष लगायें।।२३।। वह अकेला तुम्हारे हजारों पुत्रों का कार्य करेगा । अश्वत्थ वृक्ष का रोपण करने वाला धनी होता है । अशोक वृक्ष का रोपण शोक को विनष्ट करता है ॥२४॥ पाकड़ वृक्ष यज्ञ करने का फल प्रदान करता है, दूध वाला वृक्ष रोपने वाले की आयु को बढ़ाता है । जामुन का वृक्ष कन्यादान का फल देता है तथा अनार का वृक्ष पत्नी प्रदान करता है ॥२५॥ अश्वत्थ वृक्ष को रोपने से रोग का नाश होता है, पलाश के वृक्ष से ब्रह्म की प्राप्ति होती हे । बहेड़े का वृक्ष लगाने वाला प्रेत होता है ॥२६॥ अंकोल लगाने से वंश की वृद्धि होती है । खैर का वृक्ष लगाने से आरोग्य
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