Srishti Khanda Extracted Page 392

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-392

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Sanskrit Original

अठाइसवॉ अध्याय भीष्य उवाच पादपानां विधि ब्रह्मन्यथावद्विस्तराद्रद । विधिना येन कर्त्तव्यं पादपारोपणं बुधैः ॥१॥ ये च लोकाः स्मृता येषां तानिदानीं वदस्व मे । पुलस्त्य उवाच पादपानां विधि वक्ष्ये तथैवोद्यानभूमिषु ॥२॥ तटाकविधिवत्सर्वं समाप्य जगतीश्वर । ऋत्विङ्मंडपसंभारमाचार्यं चापि तद्विधम् ॥३॥ पूजयेदब्राह्मणांस्तद्दद्धेमवस्त्रानुलेपनैः । सरवौषध्युदकैः सिक्तान् दध्यक्षतविभूषितान् ॥४॥ वृक्षान्माल्यै रलंकृत्य वासोभिरभिवेष्टयेत्। सूच्या सौवर्णया कार्य सर्वेषां कर्णवेधनम् ॥५॥ अंजनं चापि दातव्यं तद्दद्धेमशलाकया । फलानि सप्तचाष्टौ वा कालधौतानि कारयेत् ॥६॥ प्रत्येकं सर्ववृक्षाणां विद्यां तान्यधिवासयेत्। धूपोऽत्र गुग्गुलुः श्रेष्ठस्ताम्रपात्रेष्वधिष्ठितान्॥७॥ सप्तधान्यस्थितान् कृत्वा वस्त्रगंधानुलेपनैः । कुंभान् सर्वेषु वृक्षेषु स्थापयित्वावनीश्वर ॥८॥ पूजयित्वा दिनांते च कृत्वाबलिनिवेदनम् । यथावल्लोकपालानामिंद्रादीनां विधानतः ॥९॥ बनस्पतेरधिवास एवं कार्यो द्विजातिभिः । ततः शुक्लांबरधरान् सौवर्णकृतमेखलान्॥९०॥ सकांस्यदोहां सौवर्णशृंगाभ्यामतिशालिनीम् । पयस्विनीं वृक्षमध्यादुत्सृजेद्रामुदङ्मुखीम्॥९ १॥ ततोभिषेकमंत्रेण वाद्यमंगलगीतकैः । ऋग्यजुः साममंत्रैश्च वारुणे रभितस्तदा ॥१२॥ तैरेवकुंभैः स्नपनं कुदुर्बराह्मणपुंगवाः । स्नातः शुक्लांबरधरो यजमानोऽभिपूजयेत् ॥९३॥ वृक्षारोपण विधि का वर्णन, अश्वत्थ आदि वृक्षों के रोपने के फलों का पृथक्-पृथक् वर्णन भीष्मजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! आप वृक्षारोपण विधि का ठीक-ठीक वर्णन करें । विद्वान् पुरुष को किस तरह से वृक्षारोपण करना चाहिए ॥१॥ वृक्षारोपण करने वाले लोगों को प्राप्त होने वाले लोकों का आप वर्णन करें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- मैं आपको वृक्षारोपण की विधि को बतलाता हूँ । उद्यान की भूमि पर ॥२॥ तटाक प्रतिष्ठा में किए जाने वाली समस्त विधियों को पूरा करके ऋत्विजों को मण्डप की सारी सामग्री देकर उसी तरह आचार्य की पूजा करे । तडाग विधि के ही समान सुवर्ण, वस्र, चन्दन, सर्वौषधि के जल से दधि एवं अक्षत को भिगोकर उससे ब्राह्मणों की पूजा करे वृक्षों को माला से अलंकृत करके उनमें वस्र लपेट दे । सभी वृक्षों का कर्णवेध संस्कार सोने की सूई से करे ॥३-५॥ उनमें सुवर्ण की शलाका से ही अञ्जन लगाये । सोने चाँदी के सात-आठ फलों का निर्माण कराये । सभी वृक्षों की वेदी के भीतर उन सबों का अधिवास कराये । हे पृथिवीपते ! गुग्गुल के श्रेष्ठ धूप को ताम्बे के पात्र में सप्तधान्य के ऊपर रखे । फिर उन वृक्षों में गन्ध एवं चन्दन लगाये, सभी वृक्षों पर कुम्भों को स्थापित करके ॥६-८॥ सायंकाल उन वृक्षों की पूजा करके इन्द्र इत्यादि लोकपालों को विधिपूर्वक बलि प्रदान करे॥९॥ द्विजातियों को इसीतरह से श्वेत वस्र धारण किए हुए तथा जिनकी मेखला सुवर्ण निर्मित हो ऐसे वनस्पतियों का अधिवास कराना चाहिए ॥१०॥ उसके बाद कांस्य दोहिनी के साथ जिसकी सींग सुवर्ण से मढे गये हों ऐसी सीधी तथा दुग्ध देने वाली गौ का वृक्ष के बीच से दान करे । गौ को उत्तराभिमुखी करके दान करे ॥११॥ उसके बाद अभिषेक मंत्रों के द्वारा मङ्गलमय गीत ध्वनि के साथ ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के वरुण देवताक मंत्रों से

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