Srishti Khanda Extracted Page 391

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-391

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Sanskrit Original

पुनर्दिनानि होतव्यं चत्वारि राजसत्तम । चतुर्थी कर्म कर्त्तव्यं देयं तत्रापि शक्तितः ॥५०॥ कृत्वा तु यज्ञपात्राणि यज्ञोपकरणानि च । ऋत्विग्भ्यस्तु समं दद्यान्मंडपं विभजेत्पुनः ॥५१॥ हेमपात्रीं च शय्यां च विप्राय च निवेदयेत्। ततः सहस्रं विप्राणामथवाऽष्टशतं तथा ॥५२॥ भोजनीयं यथाशक्ति पंचाशद्वाथविंशतिः । एवमेष पुराणेषु तटाकविधिरुच्यते।५ ३॥ कूपवापीषु सर्वासु तथा पुष्करिणीषु च । एष एवविधिर्दृष्टः प्रतिष्ठासु तथैव च ॥५४॥ मंत्रतस्तु विशेषः स्यात्प्रासादोद्यानभूमिषु । अयं त्वशक्तावर्धेन विधिर्दृष्टः स्वयंभुवा ॥५५॥ स्वल्पेष्वेकाम्रिवत्कायों वित्तशाठ्यविवर्जितैः । प्रावृट्काले स्थितं तोयमभ्षिष्टोमसमं स्मृतम् ॥५६॥ शरत्कालस्थितं यत्स्यात्तदुक्तफलदायकम् । वाजपेयातिरात्राभ्यां हेमंते शिशिरे स्थितम् ॥५७॥ अश्वमेधसमं प्राहु र्व॑संतसमये स्थितम्। ग्रीष्मेपि यत्स्थितं यत्स्यात्तदुक्तफलदायकम् ॥५८॥ एतान् महाराज विशेषधर्मान् करोति चोर्व्यामतिशुद्धबुद्धिः । स यातिब्रह्मालयमेव शुद्धः कल्पाननेकान्दिवि मोदते च ॥५९॥ अनेकलोकान्विचरन्स्वरादीन् भुक्त्वापरार्घद्र्यमङ्गनाभिः । सहैव विष्णोः परमं पदं यत्प्राप्रोति तद्योगबलेन भूयः ॥६०॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे तटाकप्रतिष्ठाविधिर्नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥२७॥ ee में चले आयें । सभी सदस्यों की पूजा करके सभी देवताओं को बलि प्रदान करे ॥४८-४९॥ हे राजश्रेष्ठ ! उसके बाद चार दिनों तक होम होते रहना चाहिए । उसके बाद चतुर्थी कर्म करे और यजमान अपनी शक्ति के अनुसार दान दें ॥५०॥ उसके बाद यज्ञ के समस्त पात्र एवं यज्ञ की सामग्री तथा मण्डप का विभाग करके सभी ऋत्विजों को समान मात्रा में दे दे ॥५१॥ सुवर्ण के पात्र तथा शय्या को ब्राह्मण को दे दे । उसके बाद एक हजार अथवा आठ सौ ॥५२॥ या अपनी शक्ति के अनुसार पचास या पच्चीस ब्राह्मणों को भोजन कराये । इसतरह से पुराणों में तड़ागप्रतिष्ठा विधि वणित है । कूप, बावली तथा पुष्करिणी की तथा उनकी प्रतिष्ठा की भी यही विधि है ॥५३-५४॥ प्रासाद, उद्यान आदि की प्रतिष्ठा में विशेष रूप से मन्त्रों का प्रयोग होता है । यह अथवा इसके आधी भी विधि की जा सकती है, यह ब्रह्माजी ने कहा है ॥५५॥ इस कार्य को एक कुण्ड के द्वारा भी सम्पन्न किया जा सकता है । इस कार्य को करने में वित्त की शठता न करे । जिस तड़ाग में केवल वर्षाकाल में ही जल रहता है उसका फल अग्निष्टोम याग के फल के समान होता है ॥५६॥ जिसमें शरत् काल तक जल रहता है, उसका भी वही फल होता है । जिसमें हेमन्त तथा शिशिर ऋतु तक जल रहता है, उसका फल वाजपेय तथा अतिरात्र यज्ञ करने के फल के समान होता है ॥५७॥ जिस तड़ाग का जल वसंत ऋतु तक रहता है उसका फल अश्वमेध याग के समान होता हे। जिसका जल ग्रीष्म ऋतु में भी रहता है उसका फल राजसूय यज्ञ के फल के समान होता है ॥५८॥ हे महाराज ! जो शुद्ध बुद्धि वाला पुरुष इन विशेष धर्मों को करता है, वह शुद्ध ब्रह्मलोक में जाता है और अनेक कल्पों तक द्युलोक में आनन्दानुभव करता है । वह अप्सराओं के साथ पराद्धकाल पर्यन्त अनेक लोकों में अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करते हुए उनका उपभोग करता है और वह अपने योग के बल से भगवान् विष्णु के लोक मे चला जाता है ॥६०॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के तटाकप्रतिष्ठा वर्णन विधि नामक सताइसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २७।। te

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