Srishti Khanda Extracted Page 389
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-389
Sanskrit Original
एवमासाद्य तत्सर्वमादावेव विशांपते। शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः ॥१९॥ सर्वौषध्युदकै: सर्वैः स्नापितो वेदपारगैः । यजमानः सपत्मीकः पुत्रपौत्रसमन्वितः ॥२०॥ पश्चिमद्वारमासाद्य प्रविशेद्यागमंडपम् । ततो मंगलशब्देन भेरीणां निःस्वनेन च॥२१॥ रजसामण्डलं कुर्यात्पंचवर्णेन तत्त्ववित् । षोडशारं ततश्चक्रं पद्मगर्भ चतुर्मुखम् ॥२२॥ चतुरस्रं तु परितो वृत्तं मध्ये सुशोभनम्। वेद्याश्चोपरितः कृत्वा ग्रहान् लोकपतींस्ततः॥२३॥ संन्यसेन्मंत्रतः सर्वान्प्रतिदिक्षु विचक्षणः । कलशं स्थापयेन्मध्ये वारुणं मंत्रमाश्रितम् ॥२४॥ ब्रह्माणं च शिवं विष्णुं तत्रैव स्थापयेद्बुधः । विनायकं च विन्यस्य कमलामंबिकां तथा ॥२५॥ शान्त्यर्थं सर्वलोकानां भूतग्रामं न्यसेत्ततः । पुष्पभक्ष्यफलै युक्तमेवं कृत्वाधिवासनम् ॥२६॥ कुंभाश्च रत्मगर्भास्तान्वासोभिः परिवेष्टयेत् । पुष्पगंधैरलंकृत्य द्वारपालान् समंततः ॥२७॥ ' यजध्वमिति तान्तरूयादाचार्यमभिपूजयेत् । वहवृचौ पूर्वतः स्थापयौ दक्षिणेन यजुर्विदौ ॥२८॥ सामगौ पश्चिमे स्थाप्यावुत्तरेण अथर्वणौ । उदङ्मुखो दक्षिणतो यजमान उपाविशेत् ॥२९॥ यजध्वमिति तान््रूयाद्याजकान्पुनरेव तान् । उत्कृष्टमंत्रजाप्येन तिष्ठध्वमिति जापकान् ॥३०॥ एवमादिश्य तान्सर्वान् संधुक्ष्याम्निं समंत्रवित् । जुहुयादाहुती म्त्रैराज्यं च समिधस्तथा ॥३९॥ ऋत्विग्भिञ्चैव होतव्यं वारुणैरेव सर्वतः । ग्रहेभ्यो विधिवद्ुत्वा तथेंद्रायेश्वराय च ॥३२॥ आचार्य को दो गुना देना चाहिए । उन सबों को वैसी ही शय्या देनी चाहिए जैसी अपने को प्रिय हो ॥१७॥ सोने के कच्छप, मगर एवं चाँदी की मछली तथा केकड़ा, ताम्बे के घडियाल तथा मेढक तथा लोहे को दो सूंस को बनवाकर पहले से ही रखना चाहिए ।।१८।। यजमान को श्वेत माला तथा श्वेत वस्त्र धारण करना चाहिए । चन्दन भी श्वेत लगाना चाहिए ।।१९।। इसके बाद वैदिक विद्वान् यजमान को सर्वोषिधि मिश्रित जल से स्नान करायें । यजमान को पत्नी, पुत्र तथा पौत्र के साथ रहना चाहिए ॥२०॥ इन सबों के साथ यजमान मण्डप में पश्चिम द्वार से प्रवेश करें । उस समय मङ्गलमय गीत और वाद्य की ध्वनि कराये ॥२१॥ तत्त्वज्ञ ब्राह्मण पाँच रङ्गों के चूर्ण से मण्डल का निर्माण करे । उसमें सोलह आरों वाले चक्र का निर्माण करना चाहिए । चक्र के बीच में कमल को भी रहना चाहिए। मण्डल को चार मुखों वाला होना चाहिए ॥२२॥ चक्र को चौकोर और सुन्दर होना चाहिए । चारो ओर से वृत्ताकार होने के साथ बीच में अधिक सुन्दर होना चाहिए । वेदी के ऊपर ग्रहों तथा लोकपालों की प्रतिष्ठा करे ॥२३॥ विद्वान् को उन सबों की प्रत्येक दिशा में स्थापना मन्त्र से करनी चाहिए । उसके बाद बीच में मन्त्रों के द्वारा कलश की स्थापना करे॥२४॥ वेदी पर ही ब्रह्मा, रुद्र तथा विष्णु की स्थापना करे । विनायक (गणेशजी) कमला (लक्ष्मीजी) तथा अम्बिका की भी स्थापना करे ॥२५॥ सभी लोकों की शान्ति के लिए भूतसमूह की भी स्थापना करे । इस प्रकार पुष्प, भक्ष्य पदार्थ, तथा फलों के द्वारा उनका अधिवास कराये ॥२६॥ कलशों के भीतर रत्नों को डालकर उन्हें वस्र से वेष्टित करे सभी द्वारपालों को पुष्प तथा चन्दन से अलंकृत करे । उसके बाद द्वारपालों (ब्राह्मणों) से पूजन करने के लिए कहे । फिर आचार्य की पूजा करे । पूर्वद्वार पर दो ऋग्वेदी ब्राह्मणों को तथा दक्षिण द्वार पर दो यजुर्वेदी ड्राह्मणों की, पश्चिम द्वार पर दो सामवेदी तथा उत्तर द्वार पर दो अथर्ववेदी ब्राह्मणों की पूजा करे । यज्ञ मण्डप की दक्षिण दिशा में यजमान उत्तराभिमुख बैठें ॥२७-२९॥ पुनः याजक ब्राह्मणों से यजमान कहे कि आपलोग यजन कीजिये । जप करने वाले ब्राह्मणों से कहे कि आपलोग उत्तम मन्त्र का जप करें ॥३०॥ इस प्रकार से ब्राह्मणों से कहकर मन्त्रज्ञ आचार्य घी तथा समिधा की आहुतियाँ दें ॥३१॥ ऋत्विजों को भी वारुण मन्त्र से होम करना चाहिए । ग्रहों की
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