Srishti Khanda Extracted Page 388
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-388
Sanskrit Original
पुण्येह्नि विप्रैः कथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । अशुभ्ैवर्जिति देशे तटाकस्य समीपतः ॥५॥ चतुर्हस्तां समां वेदीं चतुरस्रां चतुर्मुखीम् । तथा षोडशहस्तः स्यान्मंडपश्च चतुर्मुखः॥६॥ वेद्यास्तु परितो गर्ता रत्मिमात्रास्त्रिमेखलाः । नव सप्ताथवा पंच ऋजुवक्त्रा नृपात्मज ॥७॥ वितस्तिमात्रा योनिः स्यात्षट्सप्तांगुलिविस्तृता। गर्ताश्च॒हस्तमात्रास्यु स्तरिपर्वोच्छ्तमेखलाः ॥८॥ सर्वतस्तु सवर्णास्युः पाकाध्वजसंयुताः । अश्वत्थोदुंबरप्लक्षवटशाखाकृतानि तु ॥९॥ मंडपस्य प्रतिदिशं द्वाराण्येतानि कारयेत् । शुभास्तत्राष्टहोतारो द्वारपालस्तथाष्ट वै ॥१०॥ अष्टौ तु जापकाः कार्या ब्राह्मणा वेदपारगाः। सर्वलक्षणसंपूर्णान् मंत्रज्ञान्विजितेंद्रियान् ॥१ १॥ कुलशीलसमायुक्तान् स्थापयेद्वै द्विजोत्तमान् । प्रतिगर्तेषु कलशा यज्ञोपकरणानि च ॥१२॥ व्यजने चासनं शुभ्रं ताम्रपात्रं सुविस्तरम् । ततस्त्वनेकवर्णास्यु र्बलयः प्रतिदैवतम् ॥१३॥ आचार्यः प्रक्षिपेद्धूमावनुमन्त्र्य विचक्षणः । अरत्निमात्रो यूपः स्यात् क्षीरवृक्षविनिर्मितः॥९४॥ यजमानप्रमाणो वा संस्थाप्यो भूतिमिच्छता । हेमालंकारिणः कार्याः पंचविंशति ऋत्विजः ॥१५॥ कुंडलानि च हैमानि केयूरकटकानि च । तथांगुलिपवित्राणि वासांसि विविधानि च ॥१६॥ दद्यात्समानि सर्वेषामाचार्ये द्विगुणं स्मृतम् । दद्याच्छ्यनसंयुक्तमात्मनश्चापि यत्प्रियम्॥ १ ७॥ सौवर्णौ कूर्ममकरौ राजतौ मत्स्यडुण्डुभौ । ताम्रौ कुंभीरमंडूकावायसः शिंशुमारकः ॥१८॥ मङ्गलमय शुक्ल पक्ष में ॥४॥ ब्राह्मणों द्वारा बतलायी गयी तिथि को सर्वप्रथम ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराये । जहाँ पर किसी भी प्रकार की अपवित्रता न हो ऐसे तालाब के सन्निकट में ही ॥५॥ चार हाथ लम्बी चार हाथ चोड़ी चतुरस्र तथा समतल वेदी का निर्माण कराये । उसके चारो ओर मुख हों । वहीं पर सोलह हाथ का चतुरस्र मण्डप बनाये । मण्डप को भी चतुर्मुख होना चाहिए ॥६॥ वेदी के चारो ओर (अरत्नि) निमुठहाथ परिमित तीन मेखलाओं का निर्माण करे । हे राजन् ! उस मण्डप में नव या सात या पाँच कुण्डों का निर्माण कराये । कुण्डों की लम्बाई चौड़ाई एक-एक निमुठहाथ की हो । योनि की लम्बाई एक वित्ता और चौड़ाई छह या सात अङ्गुल हो । कुण्डों की गहराई भी एक हाथ की होनी चाहिए मेखलाओं की ऊंचाई तीन पर्व की होनी चाहिए ।।७-८॥ मेखलाओं को एक समान र्ङ्गवाली होना चाहिए । उन्हें ध्वजाओं एवं पताकाओं से अलंकृत करे । मण्डप के चारो दिशाओं में चारो द्वारों के स्तम्भों की लकड़ी पिप्पल, बड़, गूलर तथा पाकड़ की होनी चाहिए ॥९॥ इन्हीं काष्ठों से मण्डप के दरवाजों को बनाना चाहिए । मण्डप के होताओं की संख्या आठ, द्वारपालों की संख्या आठ और ब्राह्मणों की संख्या भी आठ होनी चाहिए । मन्त्रों का जप करने वाले ब्राह्मणों को भी आठ होना चाहिए । उन ब्राह्मणों को वेदों का विद्वान् होना चाहिए। उन्हें समस्त लक्षणों से सम्पन्न मन्त्रों का ज्ञाता तथा जितेन्द्रिय होना चाहिए ॥११॥ ब्राह्मणों को कुल तथा शील गुण सम्पन्न होना चाहिए । प्रत्येक कुण्डों पर कलश तथा यज्ञ की सामग्री होनी चाहिए ॥१२॥ व्यजन, स्वच्छ आसन तथा विस्तृत ताम्रपात्र होना चाहिए । उसके बाद प्रत्येक देवताओं के लिए अनेक वर्णों (स्ङ्गों) वाली बलि की सामग्री (दही, चावल इत्यादि) को रहना चाहिए ॥१३॥ वेदज्ञ आचार्य को उन सबों को अभिमन्त्रित करके पृथिवी पर बलि समर्पित करना चाहिए । दूध वाले वृक्ष का बना हुआ यूप (स्तम्भ) अरत्नि मात्र का होना चाहिए ॥१४॥ ऐश्वर्य चाहने वाले यजमान के होने पर स्तम्भ की लम्बाई यजमान के बराबर होनी चाहिए । उसके बाद पच्चीस ऋत्विजों का वरण करके उन्हें सुवर्ण निर्मित ॥१५॥ कुण्डल, केयूर, कटक (कड़ा), अङ्गूठी तथा पवित्रक इत्यादि अलङ्कारो से अलङ्कृत करे । इन्हें अनेक प्रकार के वस्रं को दे ॥१६।। सभी ऋत्विजों को एक समान वरण देना चाहिए, किन्तु
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