Srishti Khanda Extracted Page 387

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-387

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Sanskrit Original

श्रीपद्ममहापुणण . सूपारोग्यायुषामेतद्विघायकमनुत्तमम् । इदमेवपितृूणां च सर्वदा वल्लभं नृप ॥२७॥ त्रैलोक्याधिपति भूत्वा सप्तकल्पशतत्रयम् । चंद्रलोकमवाप्रोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥२८॥ नारी वा रोहिणी चंद्रशयनं या समाचरेत् । सापि तत्फलमाप्रोति पुनरावृत्ति दुर्लभम् ॥२९॥ इति पठति श्रृणोति वा य इत्थं मधुमथनार्चनमिन्दुकीर्तनेन । मतिमपि च ददाति सोपि शौरेर्भवनगतः परिपूज्यतेमरौधैः ॥३०॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टखंडे रोहिणीचंद्रशयनव्रतं नाम षडिँवशोऽध्यायः ॥२६॥ re सत्ताइसवो अध्याय भीष्म उवाच तटाकारामकूपेषु वापीषु नलिनीषु च। विधिं वदस्व मे ब्रह्मन् देवतायतनेषु च ॥१॥ के तत्र ऋत्विजो विप्रा वेदी वा कीदूशी भवेत् । दक्षिणा वलयः कालः स्थानमाचार्य एव च॥२॥ द्रव्याणि कानि शस्तानि सर्वमाचाक्ष्व सुव्रत। पुलस्त्य उवाच श्रृणु राजन्महाबाहो तटाकादिषु यो विधिः ॥३॥ पुराणेष्वितिहासोऽयं पठ्यते राजसत्तम । प्राप्य पक्षं शुभं शुक्लं संप्राप्तेचोत्तरायणे ॥४॥ भक्ति हो । हे अनघ भीष्म ! इस प्रकार से संसार से भयभीत तथा मुक्ति चाहने वाले को ॥२६॥ रूप, आरोग्य तथा दीर्घ आयु प्रदान करने वाला यह सर्वोत्तम व्रत हैं । यह व्रत पितरों को अत्यन्त प्रिय है ॥२७॥ शरीर त्याग करने के पश्चात् व्रती इक्कीस सौ कल्पों तक त्रैलोक्य का स्वामी होकर, संसार में पुनरावृत्ति रहित दुर्लभ चन्द्रलोक को प्राप्त करता है ॥२८॥ यदि कोई नारी इस रोहिणी चन्द्रशयन ब्रत को करती है तो वह भी पुनरावृत्ति रहित दुर्लभ फल को प्राप्त करती है ॥२९॥ चन्द्रमा के नाम कीर्तन द्वारा भगवान् मधुसूदन की पूजा के इस प्रसङ्ग को जो पढता अथवा सुनता है, उसको श्रीभगवान् उत्तमबुद्धि प्रदान करते हैं । अन्त में वह श्रीभगवान् के धाम में जाकर देवताओं के द्वारा पूजित होता है ॥३०॥ इस तरह पद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के रोहिणी चन्द्रशयनव्रत विधान वर्णन नामक छब्बीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २६।। --५-- तडाग प्रतिष्ठा, वृक्षारोपणप्रतिष्ठा, वापीप्रतिष्ठा, कूपप्रतिष्ठा तथा सरोवरप्रतिष्ठा का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् !आप मुझे, तटाक, आराम (उद्यान), कूप, बावली, कमलिनी तथा मन्दिर - आदि की प्रतिष्ठा की विधि को बतलायें ।।१॥ उसमें ऋत्विक् कौन ब्राह्मण होते हैं ? वेदी कैसी होनी चाहिए ? दक्षिणा, वल्लियाँ, काल, स्थान तथा आचार्य किसको होना चाहिए 2॥२॥ उसमें उत्तम द्रव्य कौन होते हैं, इन सारी बातों को मुझे बतलायें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा--- हे राजन् ! तटाक आदि की स्थापना में कौन सी विधि होनी चाहिए इस बात को आप सुनें ॥३॥ हे राजश्रेष्ठ ! पुराणों में यह इतिहास पढा गया है । उत्तरायण के आ जाने पर

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