Srishti Khanda Extracted Page 386
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-386
Sanskrit Original
| सृष्टिखण्ड ३६९ देय: प्रभाते सहिरण्यवारि कुंभो नमः पापविनाशनाय । संप्राश्य गोमूत्रममांसमन्न मक्षारमष्टाबथविशत्ति च ॥१५॥ ग्रासांश्च त्रीन् सर्पियुतानुपोष्य भुक्त्वेतिहासं श्रणुयान्मुहूतम् । कदंबनीलोत्पलकेतकानि, जातिः सरोजं शतपत्रिका च ॥१६॥ . अम्लानपुष्पाण्यथ सिंदुवारं पुष्पं पुनर्भारत मल्लिकायाः । शुक्लं च पुष्पं करवीर पुष्पं श्री चंपकं चंद्रमसे प्रदेयम् ॥९७॥ श्रावणादिषु मासेषु क्रमादेतानि सर्वदा । यस्मिन्मासे ब्रतादिः स्यात्तत्पुष्पैरर्चयेद्धरिम् ॥९८॥ एवं संवत्सरं यावदुपोष्य विधिवन्नरः । व्रतांते शयनं दद्याच्छयनोपस्करान्वितम् ॥१९॥ रोहिणी चंद्र मिथुनं कारयित्वा तु कांचनम् । चंद्रः षडंगुलः कार्यो रोहिणी चतुरंगुला ॥२०॥ मुक्ताफलाष्टकयुतां सितनेत्रसमन्विताम् । क्षीरकुंभोपरि पुनः कांस्यपात्राक्षतान्विताम् ॥२१॥ दद्या्मंत्रेण पूर्वाह्ने शालीक्षुफलंसंयुताम् । श्वेतामथ सुवर्णास्यां रौप्यखुरसमन्विताम् ॥२२॥ सवस्त्रभाजनां धेनुं तथा शंखं च भाजनम्। भूषणै हिँजदाम्पत्यमलंकृत्य गुणान्वितम् ॥२३॥ चंद्रोऽयं विप्ररूपेण सभार्य इति कल्पयेत् । यथाते रोहिणी कृष्ण शयनं न त्यजेदपि॥२४॥ सोमरूपस्य वै तदन्न मे भेदोविभूतिभिः । यथा त्वमेव सर्वेषां परमानंदमुक्तिदः ॥२५॥ भुक्तिर्मुक्तिस्तथा भक्तिस्त्वयि चंद्र दृढास्तु मे । इति संसारभीतस्य मुक्तिकामस्य चानघ ॥२६॥ नैवेद्यों तथा धूप आदि से पूजा करके रात्रि में भूमि पर सो जाय प्रातःकाल जगकर स्नान करे और उसके पश्चात् ब्राह्मणों को हविष्य से भोजन कराये ॥१४॥ इसके बाद प्रातःकाल ब्राह्मण को घी तथा सुवर्ण के साथ जल से भरे घड़े का दान करना चाहिये । दान करते समय पापबिनाशनाय नमः इस मन्त्र का उच्चारण करे । उसके बाद गोमूत्र पीकर दिन भर उपवास करे और रात्रि में मांस तथा नमक रहित अन्न के इकतीस ग्रास को घी के साथ खाना चाहिये। उसके बाद मुहूर्त भर इतिहास का श्रवण करे । हे राजन् ! कदम्ब, नीलकमल, केवड़ा, जाती पुष्प, शतपत्रिका। १५-१६॥ बिना कुम्हलाये हुए सिन्दुवार के पुष्प, मल्लिका के पुष्प, उजले पुष्प, करवीर पुष्प तथा चम्पा के पुष्प को चन्द्रमा पर चढाना चाहिए ॥१७॥ इन समस्त पुष्पों में से श्रावण आदि महीनों में एक-एक प्रकार के पुष्प को चढाये और जिस महीने में ब्रत प्रारम्भ किया गया हो उस मास में इन विभिन्न प्रकार के पुष्पों से श्रीहरि की पूजा करनी चाहिए ।।१८।। इस तरह एक वर्ष तक विधिपूर्वक ब्रत करके मनुष्य व्रत के अन्त में शय्या की सभी सामग्री के साथ शय्या दान करे ॥१९॥ रोहिणी तथा चन्द्रमा इन दोनों की सुवर्ण की मूर्ति बनवा दे । चन्द्रमा की मूर्ति छह अङ्गुल की तथा रोहिणी की मूर्ति चार अङ्गुल की होनी चाहिए ॥२०॥ उन दोनों मूर्तियों को आठ मोतियों तथा श्वेत त्र से युक्त करके दूध भरे कलश के ऊपर चावल भरे कांस्य पात्र में रखकर ब्राह्मण को दान दे ॥२१॥ उसके पश्चात् सुवर्ण मढे मुख वाली तथा चाँदी मढे मुखवाली श्वेतवर्ण की वस्र एवं पात्र के साथ दूध देने वाली गौ का दान करे । गुण सम्पन्न ब्राह्मण दम्पती को भूषणों से अलङ्कृत करके ॥२२-२३॥ मन में ऐसी कल्पना करके ब्राह्मण दम्पती के रूप में अपनी पत्नी के साथ ये चन्द्रमा ही हैं । ब्राह्मण दम्पती के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करे-- हे चन्द्र स्वरूप कृष्ण ! जिस तरह से रोहिणी देवी आप की शय्या का परित्याग नहीं करती हैं ॥२४॥ उसी तरह से मेरे ऐश्वर्यो में किसी प्रकार का भेद न हो ।-जिसतरह से आप अपने समस्त भक्तों को परमानंद तथा मुक्ति प्रदान करते हैं ॥२५॥ उसी तरह हे चन्द्र स्वरूप भगवन् ! मुझे भोग तथा मोक्ष की प्राप्ति हो और आपमें मेरी सुदृढ
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