Srishti Khanda Extracted Page 382

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-382

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Sanskrit Original

मृगेर्चनीया रसना पुरारे रौद्रे तु दंताहरये नमस्ते। नमः सवित्रे इति शङ्करस्य नासाभिपूज्या चपुनर्वसौच ॥९३॥ ललाटमम्भोरुहवल्लभाय पुष्ये$लकान्वेदशरीरथारिणे । सार्पे च मौलिं विबुधप्रियाय मघासु कर्णावितिपूजनीयौ ॥९४॥ पूर्वासु गोब्राह्मणनंदनाय नेत्राणि संपूज्यतमानि शंभोः । अथोत्तराफाल्गुनिभे भ्रुवौ च विश्वेश्वरायेति च पूजनीये ॥१५॥ ४ नमोस्तु पाशांकुशपद्मशूल कपालसर्पेन्दु धनुर्धराय । गयासुरानङ्गपुरांधकादि विनाशमूलाय नमः शिवाय ॥१६॥ इत्यादिकांगान च पूजयित्वा विश्वेश्वरायेति शिरोभिपूज्यम् । अत्रापि भोक्तव्यमतैलमन्न ममांसमक्षारमभुक्तशेषम् ॥९७॥ इयेवं नृप नक्तानि कृत्वादद्यात्पुनर्वसौ । शालेयतंडुलप्रस्थमौदुंबरमथो घृतम् ॥१८॥ संस्थाप्य पात्रे विप्राय सहिरण्यं निवेदयेत् । सप्तमे वस्त्रयुग्म तु पारणे त्वधिकं भवेत् ॥१९॥ चतुर्दशे तु संप्राप्तपारणे भारतादिके । ब्राणं भोजयेद्भक्त्या गुडक्षीरघृतादिभिः॥२०॥ कृत्वा च कांचनं पडामष्टपत्रं सक्णिकम्। शुद्धमष्टांगुलं तच्च पद्रागदलान्वितम् ॥२१॥ शय्यांसुलक्षणां कृत्वा विरूद्धग्रंथिवर्जिताम् । सोपधानवितानां च स्वास्तरावरणाश्रयाम् ॥२२॥ पादुकोपानहच्छत्र चामरासनदर्पणः । भूषणैरपि संयुक्तां फलवस्त्रानुलेपनैः ॥२३॥ में नखों की पूजा सप्ताश्व धुरंधराय नमः इस मन्त्र से करे ॥११॥ भरणी नक्षत्र में कठोरधाम्ने नमः इस मंत्र से कण्ठ की पूजा करे । कृतिका में ग्रीवा की, रोहिणी में ओठों की मृगशिरा में जिह्वा की तथा आर्द्रा में हरये नमः इस मन्त्र से सूर्यदेव की दांतों की पूजा करे । पुनर्वसु में सवित्रे नमः इस मंत्र से शङ्करजी के नाकों की पूजा करे ॥११-१३॥ पुष्य नक्षत्र में अम्भोरुह बल्लभाय नमः इस मंत्र से ललाट की पूजा करे बेदशरीरधारिणे नमः इस मन्त्र से शङ्करजी के केशों की पूजा करे । आश्लेषा तथा मधा नक्षत्र में विबुधप्रियाय नमः इस मंत्र शिर की तथा दोनों कानों की पूजा करे ॥१४॥ पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में गो ब्राह्मणनंदनाय नमः इस मंत्र से शङ्करजी के नेत्रों की पूजा करे । उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में विश्वेश्वराय नमः इस मंत्र से दोनों भौहों की पूजा करनी चाहिए ।।१५।। इसके बाद हाथ जोड़कर शङ्करजी की प्रार्थना करे-- पाश, अङ्कुश, पदम, त्रिशूल, कपाल, सर्प, चन्द्र तथा धनुष को धारण करने वाले गयासुर, कामदेव, त्रिपुरासुर तथा अंधकासुर आदि असुरों का विनाश करने वाले, शिवजी को नमस्कार है॥१६॥ इसतरह से शिवजी के अ्गों की पूजा करके विश्वेश्वराय नमः इस मंत्र से शिवजी की पूजा करे । इस ब्रत में भी रात्रि को तेल, मांस तथा नमक रहित भोजन करना चाहिए ॥१७॥ हे राजन् भीष्म ! इसतरह से रात्रि में पूजन करने के बाद पुनर्वसु नक्षत्र में प्रातःकाल अगहनी का एक प्रस्थ चावल उदूम्बर पात्र तथा घी ब्राह्मण को दान दें ॥१८॥ इन सबों को एक पात्र में सुवर्ण रखकर उसके साथ ब्राह्मण को दान दे सातवें बार के व्रत में पारण के समय दो वस्र अधिक दान देना चाहिए ॥१९॥ हे भारत ! जब चौदहवें बार व्रत करना हो तो पारण के समय ब्राह्मणों को भक्ति पूर्वक, गुड तथा खीरान्न एवं धृत आदि से भोजन कराये ॥२०॥ सुवर्णनिर्मित कार्णिका से युक्त अष्टदल कमल जिसमें नीलम रत्न जड़ा हो दान दे । कमल को आठ अङ्गल का होना चाहिए ॥२१॥ विरुद्ध गंथि रहित सुन्दर शय्या तकिया तथा विस्तर से युक्त होनी चाहिए । ऊपर चादनी होनी चाहिए । उसके सन्निकट में खड़ाऊं, जूता,

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