Srishti Khanda Extracted Page 381
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-381
Sanskrit Original
आदित्यशयनं नाम यथावच्छंकरार्चनम् । येषु नक्षत्रयोगेषु पुराणज्ञाः प्रचक्षते॥३॥ यदा हस्तेन सप्तम्यामादित्यस्य दिनं भवेत् । सूर्यस्य चापि संक्रांतिस्तिथिस्सा सार्वकामिकी ॥४॥ उमामहेश्वरस्यार्चामर्चयेत्सूर्यनामभिः । सूर्यर्चा शिवलिंगं च उभयं पूजयेद्यतः॥५॥ उमापतेरवेश्चापि न भेदः क्वचिदिष्यते । यस्मात्तस्माञ्चपश्रेष्ठ गृहे भानुं समर्चयेत् ॥६॥ हस्तेन सूर्याय नमोस्तु पादा वर्काय चित्रासु च गुल्फदेशं । स्वातीषु जङ्के पुरुषोत्तमाय धात्रेविशाखासु च जानुदेशम् ॥७॥ तथानुराधासु नमोभिपूज्य मूरुद्दयं चैव सहस्रभानोः । ज्येष्ठास्वनंगाय नमोस्तु गुह्य मिन्द्राय भीमाय कटिं च मूले ॥८॥ पूरवोत्तराषाढयुगे च नाभिं त्वष्ट्रे नमः सप्ततुरंगमाय । तीक्ष्णांशवे श्रवणे चाथ कुक्षिं पृष्ठं धानिष्ठासु विकर्तनाय ॥९॥ वक्षस्थलं ध्वांतविनाशनाय जलाधिपक्षें प्रतिपूजनीयम् । पूर्वोत्तराभाद्रपदद्यये च बाहूत्तमश्चंडकराय पूज्यौ ॥१०॥ साम्नामधीशय करद्दयंच संपूजनीयं नृप रेवतीघु । नखानिपूज्यानि तथाश्चिनीषु नमोस्तु सप्ताश्वधुरं धराय॥१ ९॥ कठोरधाम्ने भरणीषु कंठं दिवाकरायेत्यभिपूजनीयम् । ग्रीवाग्मिपक्षे धरसंपुटे तु संपूजयेद्धात रोहिणीषु ॥९२॥ करने में असमर्थ हो, किन्तु ब्रत के फल को प्राप्त करना चाहता हो, उसके द्वारा किए जाने योग्य ब्रत को आप बतलाइये ॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- जो व्यक्ति उपवास नही कर सकें उसको ऐसा व्रत करना चाहिए जिसमें रात्रि में भोजन किया जा सके । इसतरह के महान् ब्रत को आप सुनें ॥२॥ ऐसा वह आदित्य शयन नामक ब्रत है, इसमें सविधि शङ्करजी की अर्चना की जाती है । जिस नक्षत्र के योग में पुराण पुरुष उसे बतलाते हैं, उसे सुनो ॥३॥ जब रविवार को सप्तमी तिथि को हस्त नक्षत्र आये तथा सूर्य की सङ्क्रान्ति भी उस दिन हो तो वह तिथि सभी कामनाओं को पूरा करने वाली होती है ॥४॥ उस तिथि को सूर्य के नामों से पार्वतीजी तथा शङ्करजी की पूजा करनी चाहिए । चूकि सूर्य की अर्चा तथा शिवलिङ्ग दोनों की पूजा की जाती है ॥५॥ उमापति और सूर्य में कोई भी भेद नहीं है । अतएव हे राजश्रेष्ठ भीष्म ! पहले अपने घर में सूर्य की पूजा करे ॥६॥ हस्त नक्षत्र मे सूर्याय नमः मन्त्र से सूर्य के दोनों पैरों की पूजा करे, चित्रा नक्षत्र में अर्काय नमः इस मन्त्र से गुल्फ प्रदेश (दोनों पिण्डलियों) की पूजा करे, स्वाती नक्षत्र में पुरुषोत्तमाय नमः इस मंत्र से दोनों जंघों की पूजा करे । विशाखा नक्षत्र में धात्रे नमः इस मंत्र से दोनों घुटनों की पूजा करे ॥७॥ अनुराधा नक्षत्र में सहस्रभानवे नमः से दोनों ऊरू प्रदेशों की अर्चा करे । ज्येष्ठा नक्षत्र में अनङ्गाय नमः इस मंत्र से गुह्य प्रदेश की पूजा करे, मूल नक्षत्र में इन्द्राय नमः भीमाय नमः इस मन्त्र से कटि प्रदेश की पूजा करे ॥८॥ पूर्वाषाढा और उत्तराषाढा में त्वष्ट्रे नमः तथा सप्ततुरङ्गमाय नमः से नाभि की पूजा करे श्रवण नक्षत्र में तीक्ष्णांशवे नमः इस मंत्र से कुक्षि प्रदेश की पूजा करे; धनिष्ठा नक्षत्र में विकर्तनाय नमः से पृष्ठ भाग की पूजा करे ॥९॥ वरुण देवताक शतभिषा नक्षत्र में ध्वान्तविनाशाय नमः इस मन्त्र से वक्ष: स्थल की पूजा करे । पूर्वाभद्रपद और उत्तराभाद्रपद इन दोनों नक्षत्रों में चण्डकराय नमः इस मन्त्र से दोनों भुजाओं की पूजा करे ॥१०॥ हे राजन् ! रेवती नक्षत्र में साम्नामधीशाय नमः इस मन्त्र से दोनों हाथों की पूजा करे । अश्विनी नक्षत्र
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