Srishti Khanda Extracted Page 380

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-380

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

शय्यां च शक्तिमान्द्यात्सर्वोपस्करसंयुताम् । यद्यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे ॥५५॥ तत्तहुणवते देयं दत्तस्याक्षयमिच्छता । ततः प्रदक्षिणं कृत्वा विसृज्य द्विजसत्तमम् ॥५६॥ नक्तं क्षीराशनं कुयदिवं चांगारकाष्टकम् । चतुरो बाथवा तस्य यत्पुण्यं तद्वदामि ते ॥५७॥ रूपसौभाग्यसंपन्नः पुमान् जन्मनि जन्मनि। विष्णौ वाथ शिवे भक्तः सप्तद्वीपधिपोभवेत् ॥५८॥ सप्तकल्पसहस्राणि रुद्रलोके महीयते । तस्मात्वमपि दैत्येद्र व्रतमेतत्समाचर ॥५९॥ इत्येवमुक्तो भुगुनंदनेन चकारसर्व व्रतमेवदैत्यः । त्वं चापि राजन्कुरु सर्वमेतद्यतोऽ क्षयं वेदविदो वदंति ॥६०॥ श्रृणोति यश्चैनमनन्यचेतास्तस्यापि सर्व भगवान् विधत्ते ॥६ ९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टखंडे अंगारकचतुर्थीव्रतं नाम चतुर्विशोऽध्यायः ॥२४॥ Ae पच्चीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच उपवासेष्वशक्तस्य तदेव फलमिच्छतः । अनभ्यासेन रोगाद्वा किमिष्टं व्रतमुच्यताम् ॥९॥ पुलस्त्य उवाच उपवासेष्वशक्तानां नक्तं भोजनमिष्यते । यस्मिन् व्रते तदप्यत्र श्रूयतां वै व्रतं महत् ॥२॥ वस्न आदि से करे । उसी मन्त्र के साथ गोमिथुन तथा भौम की मूर्ति का दान करे ॥५४॥ यदि ब्रती शक्तिमान हो तो उसे सभी सामग्रियों के साथ शय्या का दान करना चाहिए । दान के अक्षय फल चाहने वाले को उन सभी वस्तुओं का दान देना चाहिए, जो सबों को अच्छी लगती हों, तथा जो अच्छी वस्तु उसके घर में हो ।॥५५॥ उन सारी वस्तुओं का गुणवान् ब्राह्मण को दान देना चाहिए । उसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करे ॥५६॥ रात्रि में दुग्धान्न का भोजन करे । इस तरह का अङ्गारक (भौम) का आठ बार या चार बार व्रत करे । इस व्रत को करने का फल मै तुम्हें सुना रहा हूँ ॥५७॥ इस व्रत को करने वाला व्यक्ति प्रत्येक जन्मों में रूप तथा सौभाग्य से सम्पन्न होता है । वह भगवान् विष्णु अथवा शिव का भक्त होता है तथा सातो द्वीपों का अधिपति होता है ॥५८॥ वह मृत्यु के बाद सात हजार कल्पों तक रुद्रलोक में निवास करता है । अतएव हे दैत्येन्द्र ! तुम भी इस ब्रत को करो ॥५९॥इस तरह मे शुक्राचार्य के कहने पर विरोचन ने सम्पूर्ण ब्रतों को किया । हे राजन् ! भीष्म तुम भी इस ब्रत को करो; क्योंकि महर्षियों ने इस ब्रत को अक्षय फल देने वाला कहा है ॥६०॥ जो व्यक्ति अनन्यमना होकर इस व्रत की विधि का श्रवण करता है, उसको भी इस व्रत के फल की प्राप्ति होती है ॥६१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के अंगारक चतुर्थी व्रत का विधान वर्णन नामक चौबीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २४।। —— Re आदित्य शयन विधान व्रत तथा उमा महेश्वर पूजन प्रकार भीष्मजी ने कहा-- उपवास करने का अभ्यास नहीं रहने के कारण अथवा रोगी होने के कारण जो उपवास

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know