Srishti Khanda Extracted Page 379

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-379

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Sanskrit Original

हे श्रीपद्ममहापुराण इति तद्डचनं श्रुत्वा विप्रः प्रोवाच सादरम् । चतुर्थ्यंगारकदिने यदा भवति दानव ॥४३॥ मृदास्नानं तदाकुर्यात् पडारागविभूषित: । अग्निर्मूर्डा दिवो मंत्रं जपेत्स्नात उदङ्मुखः ॥४४॥ शूद्रस्तूष्णी स्मरन्भौममास्तां भोगविवर्जितः । अथास्तमित आदित्ये गोमयेनानुलेपयेत्॥४५॥ प्रांगणं पुष्पमालाभि रक्षताद्धिः समंततः । तदभ्यर्च्यालिखेत्पद्मं कुंकुमेनाष्टपत्रकम् ॥४६॥ कुंकुमस्याप्यभावेन रक्तचंदनमिष्यते । चत्वारः करकाः कार्याः भक्ष्यभोज्यसमन्विताः ॥४७॥ तंडुलै रक्तशालेयैः पद्मरागैश्च संयुताः । चतुःकोणेषु तान्कृत्वा फलानि विविधानि च ॥४८॥ गंधमाल्यादिकं सर्व॑ तथैव विनिवेशयेत् । सुवर्णशृंगां कपिलामथार्च्य रौप्यैः खुरैः कांस्यदोहांसवस्त्राम् ॥४ ९॥ धुरंधरं रक्तखुरं च सौम्यं धान्यानि सप्तांबरसंयुतानि । अंगुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव सौवर्णमप्यायतबाहुदंडम् ॥५ ०॥ चुतुर्भुजं हेममयं च ताम्र पात्रे गुडस्योपरि सर्पियुक्तम् । सामस्वरज्ञाय जितेंद्रियाय वाग्रूपशीलान्वयसंयुताय ॥५१॥ दातव्येतत्सकलं द्विजाय कुटुम्बिने नैव तु दंभयुक्ते। भूमिपुत्रहाभाग स्वेदोद्भव पिनाकिनः॥५ २॥ रूपार्थी त्वां प्रपन्नोहं गृहाणार्घ्यं नमोस्तु ते। मंत्रेणानेन दत्वार्घ्यं रक्तचंदनवारिणा ॥५३॥ ततोर्चयेद्रिप्रवरं रक्माल्यांबरादिभिः । दद्यात्तेनैव मंत्रेण भौमं गोमिथुनान्वितम् ॥५४॥ ESOS SSS SRP प्रह्मादनदंन वीर विरोचन ने फिर पूछा । विरोचन ने कहा-- हे भगवन् ! मैं उस ब्रत को अच्छी तरह से जानना चाहता हूँ ॥४१॥ दूसरे जन्म में मैंने जो दान दिया था उसके माहात्म्य और विधि को आप मुझे ठीक-ठीक बतलायें।।४२।। विरोचन की बातों को सुनकर शुक्राचार्य ने आदर पूर्वक कहा-- हे दानव जब किसी भौमवार को चतुर्थी तिथि आये ॥४३॥ उस दिन मिट्टी शरीर में लगाकर स्नान करे और फिर पद्मराग आदि से अलंकृत होकर स्नान करके अग्निमू्द्वा दिवः इत्यादि मन्त्र का उत्तराभिमुख बैठकर जप करे । शूद्र को चाहिए कि वह मौन रहकर भौम का स्मरण करे तथा भोगों से रहित रहे । फिर सूर्यास्त होने पर भूमि को गोबर से लिप दे ॥४५॥ उसके बाद आंगन को अक्षत पुष्पमाला तथा जल से अलंकृत करके कुंकुम के द्वारा अष्टदल कमल का निर्माण करे ॥४६॥ कुंकुम का अभाव रहने पर रक्त चन्दन से कमल बनाये । उसके बाद भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थो से चार करकाओं की स्थापना करे ॥४७॥ उन सबों को लाल चावल तथा पद्मरागमणि से युक्त होना चाहिए । उन करकों को चारो कोनों पर रखकर, उन सबों पर अनेक प्रकार के फलों को रखे ॥४८॥ फिर उसे चन्दन इत्यादि से अलंकृत करे । उसके पश्चात् जिसके सींग सोने के तथा खुर चाँदी से मढे गये हों ऐसी कपिला गौ की पूजा करके, कांसे के दोहन पात्र तथा वस्न के साथ ॥४९॥ तथा उसके साथ लाल खुरवाले, सीधा बैल तथा वस्र से ढंके हुए सात प्रकार के अन्न, सुवर्ण निर्मित अङ्गुष्ठ परिमाणक लम्बी भुजाओं वाले पुरुष ॥५०॥ जिसकी चार भुजाएँ हों, उसको ताम्बे के पात्र में गुड और घी के ऊपर रखकर सामस्वर के ज्ञाता, जितेन्द्रिय, वाणी, रूप, शील तथा सद्वंश से युक्त ब्राह्मण को ॥५१॥ इन सारी वस्तुओं का दान दे । उस ब्राह्मण को गृहस्थ होना चाहिये तथा अभिमानी नहीं होना चाहिए । उसके बाद मङ्गल को रक्त चन्दन के जल से निम्नाङ्कित मन्त्र को पढते हुए अर्ध्य प्रदान करना चाहिए- हे शङ्करजी के पसीने से उत्पन्न होने वाले भूमिपुत्र ! आपको नमस्कार है । मैं रूप को प्राप्त करना चाहता हूँ और आपके शरणागत हूँ, आप इस अर्घ्य को स्वीकार करें; आपको नमस्कार है ॥५२-५३॥ इसके बाद उस ब्राह्मण की पूजा रक्त माला एवं

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