Srishti Khanda Extracted Page 378

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-378

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Sanskrit Original

कृत्वा सयज्ञमथनं पुनर्भूतस्य संपल्वः । त्रिजगदृहनाद्धयः शिवेन विनिवारितः ॥२९॥ कृतं त्वया वीरभद्र दक्षयज्ञविनाशनम् । इदानीमलमेतेन लोकदाहेन कर्मणा ॥३०॥. शांतिप्रदानात्सर्वेषां ग्रहाणां प्रथमो भव । प्रहृष्टाभिजनाः पूजां करिष्यंति कृतात्मनः ॥३१॥ अंगारक इति ख्यातिं गमिष्यसि धरात्मज । देवलोके द्वितीयं च तव रूपं भविष्यति ॥३२॥ ये च त्वां पूजयिष्यंति चतुर्थ्या तु दिने नरा: । रूपमारोग्यमैश्वर्य तेष्वनंतं भविष्यति ॥३३॥ एवमुक्तस्ततः शांतिमगमत्कामरूपधृत् । सजातस्तत्क्षणाद्राजन् अ्रहत्वमगमत्पुनः॥। ३ ४॥ स कदाचिद्धवांस्तस्य पूजार्घादिकमुत्तमम्। दृष्टवान् क्रियामाणं च शूद्रेण त्वं व्यवस्थितः ॥३५॥ तेन त्वं रूपवान् जातो सुरः शत्रुकुलाशनिः । विविधा च रुचिर्जाता यस्मात्तव विदूरगा॥३६॥ विरोचन इति प्राहुस्तस्मात्वां देवदानवाः । शूद्रेणक्रियमाणस्य व्रतस्य तददर्शनात् ॥३७॥ ईद्शीरूपसंपत्तिरिति विस्मितवानहम् । साधुसाध्विति तेनोक्तमहो महात्म्यमुत्तमम् ॥३८॥ पश्यतोपि भवेद्रूपमैश्वर्यं किमुकुर्वतः । यस्माच्च भक्तयाधरणीसुतस्य विनिंद्यमानेन गवादिदानम् ॥३९॥ आलोकितं तेन सुरारिगर्भे संभूतिरेषा तव दैत्यजाता । अथ तद्वचनं श्रुत्वाभार्गवस्य महात्मनः ॥४०॥ प्रह्मदनंदनो वीरः पुनः पप्रच्छभार्गवम् । विरोचन उवाच भगवंस्तद्व्रतं सम्यक् श्रोतुमिच्छामि तत्वतः ॥४९॥ दीयमानं तु यद्दानं मया दृष्टं भवांतरे। माहात्म्यं च विधिं तस्य यथावद्दक्तुमर्हसि ॥४२॥ दिया ॥२७॥ वही अनेक मुखों तथा नेत्रों से युक्त अग्नि के समान भयङ्कर दशो हजार हाथों और पैरों से युक्त वीरभद्र हो गया ॥२८॥ दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने के बाद त्रैलोक्य को भस्म करके प्रलय करने के लिए उद्यत वीरभद्र को शङ्करजी ने रोका ॥२९॥ उन्होंने कहा वीरभद्र ! तुमने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया, बस बहुत हो गया, लोकों को जलाओ मत ॥३०॥ शान्ति प्रदान करने के कारण तुम सभी ग्रहों में प्रधान बन जाओ । तुम्हारी पूजा भद्र पुरुष प्रसन्नता पूर्वक करेंगे ॥३१॥ तुम पृथिवी के पुत्र अङ्गारक (मङ्गल) के नाम से प्रसिद्ध होओगे । देवलोक में तुम्हारा रूप दूसरा होगा ॥३२॥ जो मनुष्य चतुर्थी तिथि को तुम्हारी पूजा करेंगे उन लोगों का अनन्त रूप, ऐश्वर्य तथा आरोग्य होगा ॥३३॥ इसके बाद अपनी इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वीरभद्र हो गये । हे राजन् ! वे उसी क्षण ग्रह बन गये ॥३४॥ एक बार तुमने उन अङ्गारक की उत्तम पूजा अर्चा इत्यादि किसी शूद्र के द्वारा की जाती हुयी को देखकर किया ॥३५॥ उसके कारण शत्रु वंश के लिए वज्र के समान तुम रूपवान् हो गये और दूर- दूर तक जाने वाली तुम्हारी अनेक प्रकार की रुचि भी उत्पन्न हुयी ॥३६॥ इसीलिए देवताओं और दानवों ने तुम्हे विरोचन कहा । शूद्र के द्वारा किए जाने वाले तुम्हारे ब्रत को देखने के कारण ॥३७॥ तुमको इतनी रूप सम्पत्ति की प्राप्ति हुयी; इसलिए मैं आश्चर्यित हूँ ।तुम्हारे उत्तम माहात्म्य को देखकर मैने साधु ! साधु !! कहा॥३८॥ जिसको देखने मात्र से भी रूप की प्राप्ति -होती है, तो उसको करने से प्राप्त होने वाले फल के विषय में क्या कहना है? चूकि भक्तिपूर्वक स्तुति किए जाने तथा तन्निमित्तक गौ आदि का दान करने से प्रसन्न अङ्गारक के द्वारा गर्भ में देखे जाने मात्र से हे दैत्य ! तुमको इतनी सम्पत्ति की प्राप्ति हुयी शुक्राचार्य की बातों को सुनकर शुक्राचार्य से ॥३९-४०॥

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