Srishti Khanda Extracted Page 377

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-377

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Sanskrit Original

कर श्रीपद्ममहापुराण प्रतिमां देवदेवस्य सोदकुंभां निवेदयेत् । एवं यस्तु पुमान्कुर्यादशून्यशयनं हरेः ॥१६॥ वित्तशाठ्येनरहितो नारायणपरायणः । न॒ तस्य पत््याविरहः कदाचिदपि जायते ॥१७॥ नारी वा विधवा ब्रह्मन् यावच्चंद्रार्कतारकम् । नविरूपौ नशोकार्तौ दंपती भवतः क्वचित् ॥१८॥ न पुत्र पशुरत्मानि क्षयं यांति पितामह । सप्तकल्पसहस्राणि सप्तकल्पशतानि च ॥१९॥ कुर्वत्नशून्यशयनं विष्णुलोके महीयते । ब्रह्मोवाच कथमारोग्यमैश्चर्य मतिर्धर्मस्थितिस्सदा ॥२०॥ अव्यंगाथपरे भक्ति विष्णौ चापि भवेत्कथम् । ईश्वर उवाच साधुब्रह्मस्त्वया पृष्टमिदानी कथयामि ते ॒ ॥२९॥ विरोचनस्य संवादं भार्गवस्य च धीमतः । प्रह्लादस्य सुतं दृष्ट्वा द्विरष्टपरिवत्सरम् ॥२२॥ तस्य रूपमिदं ब्रह्मन् सोहसद्धुगुनंदनः । साधुसाधुमहाबाहो विरोचन शिवं तव॥२३॥ तत्तथाहसितं तस्य पप्रच्छसुरसूदनः । ब्रह्मन्किमर्थमेतत्ते हास्यं वै मामकं कृतम् ॥२४॥ साधुसाध्विति मामेवमुक्तवांस्त्वं वदस्व मे तमेवं वादिनं युक्तमुवाचवदतां वरः॥२५॥ विस्मयाद्वतमाहात्म्या द्वास्यमेतत्कृतं मया । पुरा दक्षविनाशाय कुपितस्य त्रिशूलिनः ॥२६॥ अपतद्धीमवक्त्रस्य स्वेदबिंदु रललाटजः । भित्वा स सप्तपातालानदहत्सप्तसागरान् ॥२७॥ अनेक वक्त्रनयनो ज्वलज्ज्वलन भीषणः । वीरभद्र इति ख्यातः करपादायुतै र्युतः॥२८॥ सामग्रियों के साथ पात्र दे और ब्राह्मण को भी, सभी सामग्रियों के साथ सुवर्णमयी शय्या का दान दे ॥१५॥ ब्राह्मण को जल के कलश के साथ श्रीभगवान् की मूर्ति भी प्रदान करे । इसी प्रकार से जो व्यक्ति श्रीहरि के अशून्यशयन ब्रत को करता है ॥१६॥ उसमें वित्त की (कंजूसी) नहीं करता है तथा भगवान् नारायण की भक्ति करता है, उसका अपनी पत्नी से वियोग कभी भी नहीं होता है ॥१७॥ इस व्रत को कोई नारी अथवा विधवा भी कर सकती है । इस व्रत को करने वाले जब तक चन्द्रमा, सूर्य तथा तारे रहते हैं, तब तक न तो वे विरूप होतें हैं और न कभी शोकार्त होते हैं ॥१८॥ हे ब्रह्माजी ! उसके पुत्र, पशु तथा रत्नों का कभी नाश भी नहीं होता है । भगवान् विष्णु के अशून्यशयन ब्रत को करने वाला मनुष्य सात हजार सात सौ कल्पों तक भगवान् विष्णु के लोक में पूजित होता है । ब्रह्माजी ने शङ्करजी से पूछा-- किस व्रत को करने से सदा आरोग्य, ऐश्वर्य तथा धार्मिकी बुद्धि बनी रहती हैं ॥१९-२०॥ तथा भगवान् विष्णु में निर्दुष्ट भक्ति किस प्रकार होती है ? श्रीशङ्करजी ने कहा-- हे ब्रह्माजी ! आपने बहुत अच्छा. प्रश्न किया है । में उसे बतलाता हूँ । आपको मैं विरोचन तथा भार्गव (शुक्राचार्य) के संवाद को सुनाता हूँ । प्रह्लद के सोलह वर्षीय पुत्र विरोचन को देखकर ॥२२॥ उसके उस रूप को देखकर शुक्राचार्य हँस पड़े । हे महाबाहो विरोचन ! बहुत अच्छा ! तुम्हारा कल्याण हो ॥२३॥ शुक्राचार्य की इस प्रकार की हँसी को देखकर विरोचन ने पूछा हे ब्रह्मन् ! आप मुझको देखकर इसतरह से कैसे हंसे 2॥२४॥ आप यह बतलायें कि आप साधु ! साधु !! कैसे कहे ? इसतरह से विरोचन के पूछने पर बोलने वालों में श्रेष्ठ शुक्राचार्य ने कहा ॥२५॥ तुम्हारी आश्चर्यमयी महिमा को देखकर मुझे हँसी आयी है । प्राचीनकाल में दक्ष का विनाश करने के लिए जब शङ्करजी कुपित हो गये ॥२६॥ उस समय शङ्करजी के ललाट से स्वेद विन्दु टपका और उसने सात पातालों का भेदन करके सात सागरों को जला

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