Srishti Khanda Extracted Page 376

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-376

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Sanskrit Original

शङ्कर उवाच श्रावणस्य द्वितीयायां कृष्णायां मधुसूदनः । क्षीरार्णवे सपत्मीकः सदा वसति केशवः ॥२॥ तस्यां संपूज्य गोविदं सर्वन्कामानवाप्नुयात् । गोभूहिरण्यदानादि सप्तकल्पशतानुगम् ॥३॥ आवाहनादिकां पूजां पूर्ववत्परिकल्पयेत् । अशून्यशयना नाम द्वितीयाऽसौ प्रकीर्तिता ॥४॥ तस्यां संपूजयेद्विष्णुमेभिर्मत्रै विधानतः । श्रीवत्सधारिन् श्रीकांत श्रीपते श्रीधराव्यय ॥५॥ गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातुधर्मार्थकामदम् । अग्नयो मा प्रणश्यन्तु देवताः पुरुषोत्तम ॥६॥ पितरो माप्रणश्न्यतु मम दांपत्यभेदतः । लक्ष्म्या वियुज्यते देवो न कदाचिद्यथा हरिः ॥७॥ तथा कलत्रसंबंधो देव मा मे वियुज्यतां । लक्ष्म्या न शून्यं वरद यथाते शयनं सदा॥८॥ शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथैव मधुसूदन । गीतवादित्रनिर्घोषान् देवदेवस्य कारयेत्॥९॥ घंटाभवेदशक्तस्य सर्ववाद्यमयी यतः । एवं संपूज्य गोविंदमश्चीयात्तैलवर्जितम् ॥१०॥ नक्तमक्षारलवणं यावत्तुस्याच्चतुष्टयम्। ततः प्रभाते संजाते लक्ष्मीपतिसमन्विताम् ॥१९॥ दीपान्नभाजनेर्युक्तां शय्यां दद्याद्विलक्षणाम् । पादुकोपानहच्छत्र चामरासनसंयुताम् ॥९२॥ अभीष्टोपस्करेर्युक्तां शुक्लपुष्पांबरावृताम् । अव्यंगाय च विप्राय वैष्णवाय कुटुंबिने ॥१३॥ दातव्या वेदविदुषे न वंध्यापतये क्वचित् । तत्रोपवेश्य दांपत्यमलंकृत्य विधानतः ॥१४॥ पत्न्यास्तु भाजनं दद्याद्धक्ष्यभोज्यसमन्वितम् । ब्राह्मणस्यापि सौवर्णीमुपस्करसन्विताम् ॥९५॥ एवं दुःख को विनष्ट करने वाले ब्रत का आप मुझे वतलाइये ॥१॥ शङ्करजी ने कहा-- श्रावण मास के कृष्ण पक्ष को द्वितीया तिथि को भगवान् मधुसूदन क्षीरसागर में अपनी पत्नी श्रीदेवी के साथ सदा निवास करते हैं ॥२॥ उस तिथि को गोविन्द की पूजा करके जीव अपने समस्त अभिलषित पदार्थो को प्राप्त कर लेता है । उस दिन गो, भूमि तया सुवर्ण आदि के दान का फल सात सा कल्पों तक प्राप्त हाता हे ॥३॥ इसमें पहले के ही समान आवाहन आदि क द्वारा पूजा कर । इस द्वितीया का नाम अशून्यशयना हे ॥४॥ इस तिथि का भगवान् विष्णु की पूजा विधिपूर्वक इन मन्त्रो से कर (श्रीभगवान् से प्रार्थना करे) हे श्रीवत्सचिह्न को धारण करने वाले श्रीपते, श्रीधर, अव्यय भगवन् !॥५॥ धर्म, अर्थ तथा काम को प्रदान करने वाला मेरा गार्हस्थ्य कभी विनष्ट न हो । हे पुरुषोत्तम ! मेरे घर के अग्नि देवता कभी विनष्ट न हों ॥६॥ मेरे दाम्पत्य में भेद होने के कारण मेरे पितृगण कभी विनष्ट न हों । जिस तरह भगवान् श्रीहरि कभी श्रीलक्ष्मीजी से अलग नहीं होते हैं ॥७॥ हे देव ! उसी तरह से मेरा पत्नी से कभी संबन्ध नहीं टूटे। हे वरदान देने वाले प्रभो ! जिसतरह आपकी शय्या कभी लक्ष्मीजी से रहित नहीं होती है ॥८॥ उसी तरह हे मधुसूदन! मेरी शय्या कभी भी शून्य न होए । इस तरह से प्रार्थना करके श्रीभगवान् के समक्ष गीत तथा वाद्य की ध्वनि कराये।।९।। जो ऐसा करने में असमर्थ हो; वह घण्टा की ही ध्वनि कराये, क्योंकि घण्टा तो सर्व वाद्य स्वरूपिणी होती हैं । इसतरह से श्रीभगवान् की पूजा करके तैल रहित भोजन करे ॥१०॥ सायंकाल, क्षार, लवण, कटु और तेल इन चारो से रहित भोजन करे । प्रातःकाल होने पर श्रीभगवान् की मूर्ति के साथ, दीपक, अन्न तथा पात्रों से युक्त विलक्षण (सुन्दर) शय्या, पादुका, उपानह (जूता) छत्र, चामर तथा आसन का दान दे ॥१२॥ शय्या को अभिप्रेत सभी सामग्रियों से युक्त, तथा श्वेत पुष्प एवं वस्र से युक्त होना चाहिए । उस शय्या को अङ्गहीन रहित, पारिवारिक वैष्णव ब्राह्मण को देना चाहिए ॥१३॥ ब्राह्मण को वेद का विद्वान् होना चाहिए और उसे बन्ध्या स्री का पति नहीं होना चाहिए । ब्राह्मण पत्नी को बैठाकर विधि पूर्वक अलंकृत करे ॥१४॥ पत्नी को भक्ष्य एवं भोज्य

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