Srishti Khanda Extracted Page 375
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-375
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण सा वारानष्टपंचाशद्यथा शक्तिसमर्पयेत् । एतळि कथितं सम्यग्भवतीनां विशेषतः ॥९३५॥ स्वधर्मोऽयं यतो भाव्यो वेश्यानामिह सर्वदा। शय्या त्यज्यते देव नकदाचिद्यथा भवान् ॥१३६॥ शय्याममाप्यशून्येयं तथास्तु मधुसूदन। गीतवादित्र निर्घोषं देवदेवस्य कारयेत् ॥१३७॥ एतद्दः कथितं सर्व वेश्याधर्ममशेषतः । पुरुहूतेन यत्प्रोक्तं दानवीषु पुरा मया॥९३८॥ तदिदं सांप्रतं सर्व भवतीष्वपि युज्यते। सर्वपापप्रशमनमनंतफलदायकम् ॥१३९॥ कल्याणिनीनां कथितं तदेतद्दश्चरं व्रतम् । करोति याशेषमुदग्रमेतत् कल्याणिनी माधवलोकसंस्था॥ १ ४०॥ सा पूजिता देवगणैरशेषै रानंदकृत्स्थानमुपैति विष्णोः । तपोधनः सोप्याभिधाय चैत दनंगदानव्रतमंगनानाम् ॥९४९॥ स्वस्थानमेष्यंति समस्तमित्थं व्रतं करिष्यंति च देवयोने ॥९४२॥ इतिपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे वेश्याव्रतकथनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ।।२३॥। re चौबीसवाँ अध्याय ब्रह्मोवाच भगवन्पुरुषस्येह स्त्रियाश्च वरदायकम् । शोकव्याधिभयं दुःखं न भवेद्येन तद्दद॥१॥ दैव या मानुष उपराग के होने पर अपने विघ्न का अनुभव करे ॥१३४॥ वह ब्राह्मण को अठावन दिन अपने को शक्ति के अनुसार समर्पित करे । यह ब्रत इन्द्र ने उन वेश्याओं के लिए कहा था । अब आपलोगों को मैंने विशेष रूप से इसे बतलाया है ॥१३५॥ उस समय भगवान् की प्रार्थना करे । यह वेश्याओं का स्वधर्म है, अतएव हे भगवन् मधुसूदन ! जिस प्रकार आप कभी भी शय्या का त्याग नहीं करते हैं उसी तरह मेरी भी शय्या कभी शून्य न हो । उस दिन गीतों तथा वाद्यों का घोष कराये ॥१३६-१३७॥ यह मैंने आपलोगों को वेश्या का धर्म बतलाया, इसी को इन्द्र ने दानवियों को बतलाया था और मैंने उसे आप लोगों को बतलाया ॥१३८॥ अत एव इन सारी बातो को आप लोगों को भी करना चाहिए । यह व्रत वेश्याओं के सभी पापों को विनष्ट करने वाला तथा अनन्त फलों को प्रदान करने वाला है ॥१३९॥ यह कल्याणिनियों का कठिन ब्रत मैंने बतलाया है । जो वेश्या इस श्रेष्ठ कल्याणिनी व्रत को पूर्ण रूप से करती है वह श्रीभगवान् के लोक में जाती है ॥१४०॥ वह सभी देवताओं से पूजित होकर भगवान् विष्णु के आनन्दप्रद लोक में जाती है । तपस्वी महर्षि दालभ्य भी इस कामदान व्रत को बतलाकर हे ब्रह्माजी अपने स्थान पर चले जायेंगे और वे अङ्गनायें भी इस व्रत को सविधि करेंगी ।। १४२॥। इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के वेश्याब्रत वर्णन नामक तेइसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २३।। =e अशून्यशयन ब्रत का वर्णन, अङ्गारक चतुर्थी व्रत, वीरभद्र को मङ्गलग्रहत्व की प्राप्ति ब्रह्माजी ने कहा-- हे भगवन् ! इस लोक में ख्रियों तथा पुरुषों को वर प्रदान करने वाले तथा शोक, भय PRET
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know