Srishti Khanda Extracted Page 374

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-374

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Sanskrit Original

तस्मै विप्राय वै दद्यान्माधव: प्रीयतामिति । यथेष्टाहारसं भुक्तमेनं द्विजमनुत्तमम् ॥१२०॥ रत्यर्थं कामदेवोयमिति चित्ते च धारयेत् । यद्यदिच्छतिविप्रें्र स्तत्तत्कुर्याद्विलासिनी ॥१२१॥ सर्वभावेन चात्मानमर्पयेत्स्मितभाषिणी। एवमादित्यवारेण सर्वमेतत्समाचरेत् ॥१२२॥ तंडुलप्रस्थदानं चयावन्मासास्त्रयोदश। ततस्त्रयोदशे मासि संप्राप्ते चास्य भामिनी ॥१२३॥ विप्रस्योपस्करैर्युक्तां शय्यां दद्याद्विचक्षणा । सोपधानां सविन्यासां स्वास्तरावरणां शुभाम् ॥१२४॥ दीपिकोपानहच्छत्र पादुकासनसंयुताम् । सपत्नीकमलंकृत्य हेमसूत्रांगुलीयकैः ॥१२५॥ सूक्ष्मवस्रैः सकटकै धूपमाल्यानुलेपनैः । कामदेवं सपत्नीकं गुडकुंभोपरिस्थितम् ॥१२६॥ ताम्रपात्रासनगतं हिमनेत्रपटावृतम् । सुकांस्यभाजनोपेतमिक्षुदंडसमन्वितम् ॥१२७॥ दद्यादनेन मंत्रेण तथैकां गां पयस्विनींम्। यथांतरं न पश्यामि कामकेशवयोः सदा॥१२८॥ तथैव सर्वकामाप्तिरस्तु विप्र सदा मम । तथा च कांचनं देवं प्रतिगृह्य द्विजोत्तमः॥१२९॥ - कोदात्कामोदादिति वैदिकं मंत्रमुदीरयेत् । ततः प्रदक्षिणीकृत्य विसृज्यद्विजपुंगवम् ॥१३०॥ शय्यासनादिकं सर्व ब्राह्मणस्य गृहं नयेत् । ततः प्रभृति योन्योपि रत्यर्थं गेहमागतः ॥१३१॥ सम्मान्यसूर्यवारेण स संपूज्यो भवेत्सदा । एवं त्रयोदशं यावन्मासमेकं द्विजोत्तमम् ॥१३२॥ तर्पयित्वा यथाकामं प्रेषयेच्चैव मंदिरम् । तदनुज्ञया रूपवन्तं यावदस्यागमों भवेत्॥९३३॥ आत्मनोपि यदाविघ्नं गर्भसूतकराजकम् । दैवं वा मानुषं वा स्यादुपरागेण वा ततः॥९३४॥ (निर्दोष) होना चाहिए । उनको एक प्रस्थ चावल तथा घी भरा पात्र दान दे ॥११९॥ उस ब्राह्मण को दान देने के समय कहे-- माधवः प्रीयताम् यथेष्ठ अहार से ब्राह्मण को सन्तुष्ट करे ॥१२०॥ स्वयं कामदेव रति करने के लिए मेरे पास आये हैं, इसतरह से मन में भावना करे, और वे ब्राह्मण जो-जो कहें उन समस्त कामों को उसे करना चाहिये ।। १२ १॥ मुस्कुराती हुयी उसे उन्हें अपने को पूर्णरूप से समर्पित कर देना चाहिए । इस तरह से उसको रविवार को आचरण करना चाहिए ॥१२२॥ तेरह महीनों तक उसे एक प्रस्थ चावल प्रदान करे । उसके बाद तेरहवें महीनें में जब वे ब्राह्मण आयें ।।१२३॥ तो उन ब्राह्मणको सभी सामग्रियों के साथ शय्या दान करे । शय्या को तकिया के साथ तथा सुन्दर विस्तर तथा चादर के साथ सुन्दर होना चाहिए ॥१२४॥ सपत्नीक ब्राह्मण को दीपक, जूता, छाता तथा खड़ाऊं के साथ सोने के जंजीर तथा अङ्गूठी आदि देना चाहिए ॥१२५॥ महीन वस्र, कटक (कंगन) धूप, माला, चन्दन से सपत्नीक कामदेव की मूर्ति को अलङ्कृत करके गुडभरे घड़े पर स्थापित करे॥ १२६॥ उनको ताम्बे के पात्र का आसन दे, सुवर्ण के नेत्रपट से अलङ्कृत करे, कांसे के पात्र तथा ईख के साथ दान दे ॥१२७॥ और उसके साथ एक दूध देने वाली गौ का दान करे । उस समय यह मन्त्र पढे-- जैसे में कामदेव तथा केशव भगवान् में अन्तर नहीं देखती हूँ ।। १२८॥ हे विप्र ! उसी तरह मेरी सारी कामना सदा पूर्ण होती रहे । उसके बाद उस सुवर्ण निर्मित कामदेव की मूर्ति को लेकर ॥१२९॥ कोऽदात् कामोदात् इत्यादि वैदिक मंत्र का उच्चारण करे । उसके बाद वेश्या को चाहिये कि उस ब्राह्मण की प्रदक्षिण करके उन्हें विदा करे ॥१३०॥ फिर शय्या तथा आसन इत्यादि सब कुछ उस ब्राह्मण के घर पहुँचवा दें । उस समय के बाद रति के लिए उस वेश्या के घर जो कोई भी ब्राह्मण रविवार के दिन आये उसका सम्मान करके वह उनकी पूजा करे । इस तरह तेरह महीनों तक किसी एक ब्राह्मण को तृप्त करके उन्हें उनकी इच्छानुसार प्रेषित करे । उन ब्राह्मण की आज्ञा प्राप्त करके उसके घर जो रूपवान व्यक्ति आये उसका सम्मान करे ॥१३१-१३३॥ स्वयं भी, गर्भ, सूतक, रजस्वलापन अथवा

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