Srishti Khanda Extracted Page 371
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-371
Sanskrit Original
rN] ४६ श्रीपदयमहापुराण गच्छन्समीपमार्गेण सांबो जांबवती सुतः । साक्षात्कन्दर्परूपेण सर्वाभिरणभूषित: ॥७८॥ अनङ्गशरतप्ताभिः साभिलाषमवेक्षितः । प्रबुद्धो मन्मथस्तासां भविष्यति यदात्मनि॥७९॥ तदवेक्ष्य जगन्नाथस्सर्वज्ञो ध्यानचक्षुषा । स्वयंप्रभुर्वक्ष्षति ता वो हरिष्यति दस्यवः ॥८०॥ अपरोक्षं यतस्त्वेवं स्निग्धमेतद्विचितितम् । ततः प्रसादितो देव इदं वक्ष्यति शार्ङ्गभृत् ॥८१॥ ताभिः शापाभितप्ताभि भगवान्भूतभावनः । उत्तराश्रितदाशानामुद्धर्ता ब्राह्मणप्रियः ॥८ २॥ उपदेक्ष्यत्यनंतात्मा भावि कल्याणकारकम् । भवतीनामृषिर्दाल्भ्यो यद्व्रतं कथयिष्यति ॥८३॥ इत्युक्त्वा ताः परित्यज्य गतोन्तर्धानमीश्वरः । ततः कालेन महता भारावतरणे कृते ॥८४॥ निवृत्ते मौसले तद्दत्केशवे दिवमागते । शून्ये यदुकुले सर्वे चौरैरपि जितेर्जुने ॥८५॥ हतासु कृष्णपत्नीषु दाशभोग्यासु चार्बुदे । तिष्ठंतीषु च दीौर्गत्यसंतप्तासु चतुर्मुख ॥८६॥ आगमिष्यति योगात्मा दाल्भ्यो नाम महातपाः । तास्तमर्ध्येणसंपूज्य प्रणिपत्य पुनः पुनः ॥८७॥ लालप्यमाना बहुशो वाष्पपर्याकुलेक्षणाः। स्मरंत्यो विविधान्भोगान् दिव्यमाल्यानुलेपनान् ॥८८॥ भर्त्तारं जगतामीशमनंतमपराजितम्। दिव्यानुभावां च पुरीं नानारत्नमृहाणि च ॥८९॥ द्वारकावासिनः सवन्दिवरूपान्कुमारकान् । प्रश्नमेतंकरिष्यंति मुनेरभिमुखं स्थिताः ॥९०॥ दस्युभिर्भगवन्सर्वाः परिभुक्ता वयं बलात्। स्वधर्मश््यावितोस्माकमस्मिन्नः शरणं भवान्॥९१॥ आदिष्टोसि पुरा ब्रह्मन् केशवेन च धीमता । कस्मादीशेन संयोगं प्राप्य वेश्यात्वमागताः ॥९२॥ अलङ्कारों से अलङ्कृत विश्वात्मा यदुवंश भूषण भगवान् श्रीकृष्ण रमण करेगे । इसके सन्निकट के मार्ग से हरिण के समान विशाल नेत्रों वाले, मालती पुष्प की माला धारण किए हुए, साक्षात् कामदेव के समान सुन्दर रूप वाले समस्त अलङ्कारों से अलङ्कृत जाम्बवती नन्दन साम्ब को काम के बाणों से व्यथित वे पत्नियाँ साभिलाष देखकर कामाकुल हो जायेंगी । उनके मन में काम का विकार उद्रिक्त हो जायेगा ॥७७-८ ०॥ जगन्नाथ जगत् के स्वामी सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण अपने ध्यान योग के द्वारा इस बात को जानकर उन सबों को शाप दे देंगे कि तुम लोगों को लुटेरे लुट लेंगे ॥८१॥ क्योंकि तुम लोगों के मन में मेरे सामने ही ऐसा विचार आया है । शाप से सन्तप्त उन पत्नियों के रारा प्रार्थना किए जाने पर भूतमावन जीवों का कल्याण करने वाले ब्राह्मण प्रिय उन सबों से भविष्यत् काल में कल्याण के साधन का उपदेश करते हुए कहेंगे कि दस्युओं (लुटेरों) द्वारा लूट लिए जाने के बाद दाल्भ्य ऋषि तुम लोगों को उद्धार का साधन बतलायेंगे ॥८२-८४॥ इसतरह से कहकर श्रीभगवान् उन सबों के सामने से ही अन्तर्धान हो जायेंगे । उसके बहुत दिनों के बाद जब भगवान् पृथिवी के भार को उतार लेंगे ॥८५॥ जब मूसल का प्रसङ्ग समाप्त हो जायेगा, भगवान् अपने लोक में चले जायेंगे और सम्पूर्ण यदुवंश विनष्ट हो जायेगा । उस समय चोरों द्वारा अर्जुन के परास्त हो जाने पर ॥८६॥ एक खरब (अर्बुद) चोरों (लुटेरें) द्वारा भगवान् कृष्ण की पत्नियों के लूट लिए जाने पर, वे सब दुर्गति ग्रस्त हो जायेंगी, उस समय हे ब्रह्माजी ॥८७॥ उन सबों के पास महातपस्वी योगी दाल्भ्य आयेंगे । वे सब उनको अर्घ्य प्रदान करके तथा पूजन पूर्वक उनको बार-बार प्रणाम करके ।।८८॥ आँखों में आँसू भरकर अत्यधिक रोती हुयी अतीत कालिक अनेक प्रकार के भोगों, दिव्य माल्य एवं चन्दनादि के अनुलेपों ॥८९॥ जगत् के स्वामी, अनन्त तथा कभी भी किसी द्वारा परास्त नहीं होने वाले अपने पति को, दिव्य प्रभाव से युक्त द्वारकापुरी को, रत्न निर्मित अपने गृहों को ॥९०॥ समस्त द्वारका वासियों तथा देवतुल्य पुत्रों को याद करती हुयी महर्षि के सामने खड़ी होकर ॥९१॥ कहेंगी कि हे भगवन् ! दस्युओं ने हमलोगों का बलपूर्वक उपभोग
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