Srishti Khanda Extracted Page 370
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-370
Sanskrit Original
अस्यां च कल्याणतिथौ विवस्वान् सहस्रधारेण सहस्ररश्मिः । स्नातः पुरा मंडलमेत्य तद्दत् तेजोमयं खेटपति ब॑भूव ॥६८॥ इदमेव कृतं महेद्रमुख्यै ् बहुभि देवसुरारिकोटिभिश्च । फलमस्येह नशक्यते हि वक्तुं यादि जिह्वायुतकोटयो मुखे स्युः ॥६९॥ कलिकलुष विदारिणीमनंता मपि कथयिष्यति यादवेंद्र सूनुः । अपि नरकगतान् पितूनथैषा ह्यलमुद्धर्तुमिहैव यः करोति ॥७०॥ इदमनघ शृणोति वक्ति भक्त्या परिपठतीह परोपकारहेतोः । इह पंकजनाभ भक्तिमान्भवे दथ शक्रस्य सपूज्यतामुपैति ॥७१॥ कल्याणिनी नाम पुरा विसर्गे या द्वादशी माघसितेभिपूज्या । सा पांडुपुत्रेण कृता भविष्य त्यंनतपुण्यानघ भीमपूर्वा ॥७२॥ ब्रह्मोवाच वर्णाश्रमाणां प्रभवः पुराणेषु मया श्रुतः । सदाचारश्च भगवान् धर्मशास्तराङ्ग विस्तरैः ॥७३॥ पण्यस्त्रीणां समाचारं श्रोतुमिच्छामि तत्वतः । ईश्वर उवाच तस्मिन्नेव पुरे ब्रह्मन्सहस्त्राणि तु षोडश ॥७४॥ वासुदेवस्य नारीणां भविष्यंत्यंबुजोद्धव । ताभिर्वसंतसमये कोकिलालिकुलाकुले ॥७५॥ पुष्पितोपवने फुल्लकह्वारसरसस्तटे। निर्भरं सहपत्नमीभिः प्रशस्ताभिरलंकृतः ॥७६॥ रमयिष्यति विश्वात्मा कृष्णो यदुकुलोद्वहः । कुरंगनयनः श्रीमान्मालतीकृतशेखरः ॥७७॥ शची हुयी । वहाँ मेरी प्रिया सत्यभामा उसकी परिचारिका थी ॥६७॥ वहाँ पर उसने इस मङ्गलमय व्रत को किया तो वह ब्राह्मण की पुत्री वेदवती हुयी ॥६८॥। इसी तिथि को इस व्रत को करते समय सूर्य ने एक हजार जलधाराओं को ग्रहण किया था । उसके फल स्वरूप वे इस प्रकार के तेजस्वी और नक्षत्रों के स्वामी हों गये ॥६९॥ महेन्द्र आदि करोड़ों देवताओं और असुरो ने भी इसी ब्रत को किया था । अतएव यदि किसी के मुख में करोड़ों भी जीभ हो तो मी वह इसके फल का वर्णन नहीं कर सकता है ॥७०॥ यादवेन्द्र सूनु भगवान् श्रीकृष्ण भी कलि के पापों को विनष्ट करने वाली तथा अनन्त फल देने वाली इस द्वादशी को बतलायेंगे । जो इस लोक में इस व्रत को करता है वह नरक में भी गये हुए अपने पितरों का उद्धार करने में समर्थ हो जाता है ॥७१॥ हे अनघ ! यदि इसको कोई पढता अथवा इसका श्रवण करता है, अथवा दूसरों का उपकार करने के लिए इसे सुनाता है तो वह इस लोक में भगवान् विष्णु का भक्त होता है, और स्वर्गलोक में इन्द्र भी उसकी पूजा करते हैं ॥७२॥ प्राचीन काल के कल्पों में जो माघमास के शक्ल पक्ष में कल्याणिनी द्वादशी के नाम से पूजित थी वह पाण्डुपुत्र भीम के द्वारा अनुष्ठित किए जाने पर अनन्त पुण्य प्रदान करने वाली भीम द्वादशी हो जायेगी ॥७३॥ ब्रह्माजी ने कहा-- मैने पुराणों में वर्णाश्रमों की उत्पत्ति को सुना है । मैंने विस्तार पूर्वक सदाचार तथा साङ्ग धर्मशाख्रों का भी श्रवण किया है । अब में अच्छी तरह से वेश्याओं के भी ब्रत को सुनना चाहता हूँ ॥७४॥ ईश्वर (भगवान् शिव) ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! उस द्वारकापुरी में ही भगवान् वासुदेव की सोलह हजार पत्नियाँ होंयेंगी । उन सबों के साथ कोयलों से परिपूर्ण वसन्त ऋतु सें॥७५-७६॥ भगवान् श्रीकृष्ण विकसित उपवन में, जिसमें कमल विकसित हों ऐसे सरोवर के तट में, उन श्रेष्ठ पत्नियों के साथ *
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