Srishti Khanda Extracted Page 369
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-369
Sanskrit Original
पयस्विन्यः शीलवत्यः कांस्यदोहसमन्विता: । रौप्यखुराः सवत्साश्च चंदनेनाभिभूषिताः ॥५६॥ तास्तु तेषां ततो दत्वा भक्ष्यभोज्येन तर्पितान् । कृत्वा वै ब्राह्मणान्सर्वान् छत्रैर्नानाविधैस्तथा ॥५७॥ भुक्त्वा चाक्षारलवणमात्मनाच विसर्जयेत् । अनुगम्यपदान्यष्टौ पुत्रभार्यासमन्वितः ॥५८॥ प्रीयतामत्र देवेशः केशवः क्लेशनाशनः । एवं गुर्वाज्ञयां कुंभान् गाश्चैव शयनानि च ॥५९॥ वासांसि चैव सर्वेषां गृहाणि प्रापयेद्दधः । अभावे बहुशय्यानामेकामपि सुसंस्कृताम् ॥६०॥ शय्यां दद्याहुही भीम सर्वोपस्करसंयुताम् । इतिहासपुराणानि वाचयित्वा तु वाहयेत् ॥६९॥ तद्दिनं कुरुशार्दूल य इच्छेद्विपुलां श्रियम्। तस्मात्त्वं सत्त्वमालंब्य भीमसेन विमत्सरः ॥६२॥ कुरूव्रतमिदं सम्यक स्नेहाह्रुह्यं मयोदितम् । त्वया कृतमिदं वीर त्वन्नाम्ना च भविष्यति ॥६३॥ सा भीमद्वादशी ह्योषा सर्वपापहरा शुभा । या तुकल्याणिनी नाम पुरा कल्पेषु पठ्यते॥६४॥ त्वं चादिकर्ता भव सौकरेस्मिन् कल्पे महावीरवरप्रधान । यस्याः स्मृतेः कीर्तनतोप्यशेषं पापं प्रणष्टं त्रिदशाधिपस्य ॥६ ५॥ दृष्ट्वा च तामप्सरसामभीष्टां वेश्या कृतामन्यभवांतरेषु । जाताथ सा वैश्यकुलोद्भवापि पुलोमकन्या पुरुहूतपत्नी ॥६६॥ तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं मम प्रिया संप्रति सत्यभामा । कृतं पुरा मङ्गलमेतदेव द्विजात्मजा वेदवती बभूव ॥६७॥ तथा मङ्गल गानों से बिताये ॥५४॥ अन्य ब्राह्मणों की अपेक्षा आचार्य को दो गुना सभी वस्तुओं का दान देना चाहिए। हे कुरुश्रेष्ठ भीष्म ! इसके बाद प्रातःकाल जगकर तेरह गायों का दान करे । सभी गायों की सींग सुवर्ण से तथा खुर चाँदी से मढे हुए होना चाहिए । सबों को दूध देने वाली, सीधी, तथा कांसे के दुग्धपात्र से युक्त होना चाहिए ॥५५-५६॥ सभी गायों को बछड़े वाली तथा चन्दन से अलङ्कृत होना चाहिए । उन सबों को भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थों से तृप्त ब्राह्मणों को देना चाहिए ॥५७॥ सभी ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का छाता प्रदान करे । फिर स्वयं नमक रहित भोजन करके ब्राह्मणों को विदा करे ॥५८॥ ब्राह्मणों को विदा करते समय पत्नी तथा पुत्र के साथ आठ पग उनके पीछे-पीछे जाय । ब्राह्मणों से आज्ञा लेकर लौटते समय कहे । मेरे इस व्रत से क्लेशों को दूर करने वाले भगवान् केशव प्रसन्न हों ॥५९॥ आचार्य की आज्ञा प्राप्त करके कलशों, गायों, शय्याओं तथा वस्रं को ब्राह्मणों के घर पहुँचवा देना चाहिए ॥६०॥ हे भीम ! यदि किसी गृहस्थ के पास अनेक शय्या न हो सके तो सभी समाग्रियों से युक्त तथा संस्कार संपन्न एक ही शय्या का दान करना चाहिए ॥६१॥ हे कुरुश्रेष्ठ ! प्रभूत सम्पत्ति प्राप्त करने की इच्छा वाले ब्रती को वह दिन इतिहासों तथा पुराणों के पाठ में बिताना चाहिए ॥६२॥ हे भीम ! तुम सत्त्वगुण को अपनाकर तथा मत्सर (द्वेष) रहित होकर इस ब्रत को अच्छी तरह से करो, स्नेहवशात् मैंने तुम्हें इसका उपदेश दिया है ॥६३॥ हे वीर ! यदि इस ब्रत को तुम करो तो यह ब्रत तुम्हारे ही नाम पर भीमद्वादशी के नाम से विख्यात होगा। यह व्रत मङ्गलमय और सभी पापों को विनष्ट करने वाला है । पहले के कल्पों में यह द्वादशी कल्याणिनी द्वादशी के नाम से कही जाती थी ॥६४॥ हे महावीरों ! में प्रधान भीम ! इस वाराह कल्प में इस व्रत को सर्वप्रथम करने वाला तुम ही बन जाओ । इसका ही अनुष्ठान करने से देवराज इन्द्र के सारे पाप विनष्ट हो गये ॥६५॥ सभी अप्सराओं से भी अधिक अभिप्रेत उस आभीर कन्या को देखकर जो इन्द्र ने पाप किया था, वही आभीर कन्या इस समय स्वर्ग में उर्वशी है ॥६६॥ पहले वह वैश्य (अहीर) वंश में उत्पन्न हुयी थी फिर वह पुलोम की पुत्री और इन्द्र की पत्नी
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