Srishti Khanda Extracted Page 368
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-368
Sanskrit Original
दक्षिणे चार्थचंद्रं तु पश्चिमे वर्तुलं तथा । अश्वत्थपत्राकारं च उत्तरेण तु कारयेत् ॥४२॥ मध्ये तु पद्माकारं च कारयेद्वैष्णवो द्विजः। पूर्वतो वेदिकां स्थानं स्थानं याम्ये च कल्पयेत्॥४३॥ पानीयधारां शिरसि धारयेद्विष्णुतत्परः। द्वितीया वेदी देवस्य तत्र पद्मं सकर्णिकम् ॥४४॥ तस्य मध्ये स्थितं देवं कुयद्वि पुरुषोत्तमम् । हस्तामात्रं च तत्कुंडं कृत्वा तत्र त्रिमेखलम् ॥४५॥ योनिवक्त्रं ततस्तस्मिन् ब्राह्मणै र्यवसर्पिषी। तिलांश्च विष्णुदैवत्यै मत्रैरेवानले हुनेत्॥४६॥ कृत्वा तु वैष्णवं सम्यग्यागं तत्र प्रकल्पयेत् । आज्यधारामध्यमे तु कुंडे दद्यात्तु यत्नतः ॥४७॥ क्षीरधारां देवदेवे वारिधारात्मनोपरि । निष्यावार्धप्रमाणां वै धारामाज्यस्य पातयेत्॥४८॥ स्वेच्छया क्षीरजलयोरविच्छिन्नां च शर्वरीम् । जलकुंभान् महावीर्यं स्थापयित्वा त्रयोदश ॥४९॥ भ्क्ष्यै र्नानाविधै रयुक्तान्सितवस्रैरलंकृतान्। प्रतानौदुंबरैः पात्रैः पंचरत्नसमन्वितैः ॥५०॥ चतु्भिर्बह्ृचैहोमः कार्यस्तत्र उदङ्मुखैः । रुद्रजाप्यश्चतुर्भिश्च यजुर्वेदपरायणैः ॥ ५ ९॥ वैष्णवानि च सामानि चतुर्भिः सामवेदिभिः । एवं द्वादश वैविप्रान्वस्त्रमाल्यानुलेपनैः ॥५२॥ पूजयेदंगुलीयैश्च कटकैहेमसूत्रकेः । वासोभिः शयनीयैश्च वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥५३॥ एवं क्षपातिवाह्या वै गीतमङ्गलनिः स्वनैः । उपाध्यायस्य च पुनर्विगुणं सर्वमेव तु ॥५४॥ ततः प्रभाते विमले समुत्थाय त्रयोदश। गावो देयाः कुरुश्रेष्ठ सौवर्णश्ृंगसंवृताः ॥५५॥ जाय । उस कलश में जल भर दे, उस कलश के नीचे काले मृगचर्म पर बैठे । और पूरी रात्रि तक उस छिद्र से गिरने वाली जल की धारा को अपने शिर पर धारण करे ॥३९-४०॥ वेदज्ञों का कहना है कि जितनी ही अधिक धाराओं को धारण किया जाय उतना ही अधिक फल होता हे । अतएव हे कुरुश्रेष्ठ ! इस व्रत को सप्रयास करना चाहिए ॥४१॥ वैष्णव ब्राह्मण को चाहिए कि वह मण्डप को दक्षिण दिशा में अर्द्ध चन्द्राकार, पश्चिम में वर्तुलाकार गोल, उत्तर दिशा में पिप्पल के पत्ते के आकार का तथा बीच में कमलाकृति बनाये । मण्डप के पूर्व में वेदी का स्थान बनाना चाहिए उसके दक्षिण ओर भी एक वेदी बनाये ॥४२-४३॥ भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए रात्रिभर जल की धारा को धारण करे । दूसरी वेदी भगवान् विष्णु की होनी चाहिए, उस पर कर्णिका युक्त कमल बनाये । उसके बीच में भगवान् पुरुषोत्तम की स्थापना करे । वहीं पर एक हाथ का कुण्ड बनाये, अर्थात् उसे एक हाथ लम्बा, एक हाथ चौड़ा और एक हाथ गहरा होना चाहिए । उसकी तीन मेखलाएँ हों ॥४३-४५॥ उसके पश्चिम में योनि बनाये । फिर उस कुण्ड में अग्नि में भगवान् विष्णु के मन्त्र से तिल, यव और घी से, ब्राह्मणों द्वारा होम कराये ॥४६॥ इस तरह से वैष्णव याग करके कुण्ड के बीच में घी की धारा (वसोर्धारा) गिराये ॥४७॥ श्रीभगवान् के ऊपर दूध की धारा तथा अपने ऊपर जल की धारा गिणाये । घी की धारा को निष्पावा (मटर) की दाल को बराबर छिद्र से गिराना चाहिए ॥४८॥ दूध और जल की धारा को अपनी इच्छा के अनुसार ही मोटी-पतली होनी चाहिए । इन दोनों धाराओं को रात्रिभर गिराना चाहिए । उसके बाद जल से भरे हुए तेरह कलशो की स्थापना करे ॥४९॥ उन कलशों को अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थो तथा श्वेत वस्र से अलङ्कृत होना चाहिए । उन्हें चाँदनी, उदूम्बर पत्र, तथा पञ्चरत्नों से भी युक्त होना चाहिए ॥५०॥ उस समय चार उत्तराभिमुख बैठे हुए ऋग्वेदी ब्राह्मणों से होम कराये चार यजुर्वेदी ब्राह्मण रुद्राध्याय का पाठ करें ॥५१॥ चार सामवेदी ब्राह्मणों को अरिष्ट वर्ग के साथ वैष्णव साम का पाठ करना चाहिए ।५२।। इसतरह से बारह ब्राह्मणों की पूजा वस्न, माला, सुवर्ण की अङ्गूठी, कंकण तथा जंजीर देकर करे ॥५३॥ उन्हें वस्त्र तथा शय्या प्रदान करे । इस कार्य में वित्तशाठय (कंजूसी) न करे । इसतरह पूरी रात गीत
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