Srishti Khanda Extracted Page 364
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-364
Sanskrit Original
न विहीनं त्वया देवि तथा मे संतु सिद्धयः । लक्ष्मीमेंधा धरा पुष्टिगौरी तुष्टिजया मतिः ॥१८४॥ एताभिः पाहि चाष्टाभि मूर्तिभिर्मा सरस्वति। एवं संपूज्यगायत्रीं वीणाकमलधारिणीम्॥१८५॥ शुक्लपुष्पाक्षतै भक्त्या सकमंडलुपुस्तकाम् । मौनव्रतेन भुंजीत सायं प्रातश्च धर्मवित् ॥१८६॥ पंचम्यां प्रतिपक्षं च गां च विप्राय शोभनाम्। तथैव तंडुलप्रस्थं घृतपात्रेण संयुतम् ॥१८७॥ क्षीरं दद्याद्धिरण्यं च गायत्री प्रीयतामिति । संध्यायां च तथा मौनमेतत्कुर्वन् समाचरेत् ॥१८८॥ न रात्र्यां भोजनं कुर्याद्यावन्मासास्रयोदश । समाप्ते तु ब्रते दद्यादभोजनं शुक्लतंडुलैः ॥१८९॥ दिव्यां वितानं घंटां च सितमेत्रपटान्विताम् । चंदनं वस्त्रयुग्म च दध्यन्नं सुरसं पुन: ॥१९०॥ अथ्योपदेष्टारमपि भक्त्या संपूजयेहुरुम् । वित्तशाठ्येन रहितो वस्जमाल्यानुलेपनैः ॥१९१॥ अनेन विधिना यस्तु कुर्यात्सारस्वतं ब्रतम्। सौभाग्यमतियुक्तस्तु सूक्ष्मकंठश्च जायते ॥१९२॥ सरस्वत्याः प्रसादेन ब्रह्मलोके महीयते। नारी वा कुरुते या तु सापि तत्फलभागिनी॥१९३॥ ब्रह्मलोके वसेद्राजन्यावत्कल्पायुतत्रयम् । सारस्वतं व्रतं यस्तु शृणुयादपि वा पठेत् ॥१९४॥ विद्याधरपुरे सोऽपि वसेदब्दायुतत्रयम् । इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे ब्रताध्यायो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२॥ i ११ < क तरह लोक पितामह भगवान् ब्रह्माजी ॥१८२॥ आपको छोडकर कहीं अलग नहीं रहते हैं उसी तरह आप मुझे दरदान दीजिये । हे देवि ! चूँकि आपकी कृपा के बिना मुझे, वेद शास्त्र, तथा धर्मशास्त्र, नृत्य, गीत तथा सिद्धियाँ इत्यादि नही प्राप्त हो सकती हैं ॥१८३॥ इसलिए आप मुझे इन सबों का वरदान दें । हे सरस्वति देवि ! आप अपने लक्ष्मी, मेधा, धारा, पुष्टि, गौरी, तुष्टि, जया तथा मति ॥१८४॥ इन आठ रूपों से मेरी रक्षा करें । इस तरह वोणा पुस्तक कमण्डलु तथा कमल को धारण करने वाली गायत्री देवी की श्वेत माला तथा श्वेत अक्षत से नक्िपृदक अच्छी तरह से पूजा करके, धर्मज्ञ पुरुष को चाहिए कि मौनव्रत धारण करके सायंकाल तथा प्रातःकाल न कर ॥१८६॥ प्रत्यक पक्ष की पञ्चमी तिथि को सायं काल ब्राह्मण को सुन्दर गो तथा सुवर्ण युक्त एक प्रस्थ चावल, घृत भरे पात्र के साथ ॥१८७॥ दान दे । उन्हें दूध का भी दान गायत्री प्रीयताम् कहकर दे । इन समस्तयों को मोनव्रत के साथ करे ॥१८८॥ उस दिन रात्रि में भोजन न करे, इसतरह से तेरह महीनों तक यह ब्रत करे। समाप्त हो जाने पर श्वेत चावलों से ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥१८९॥ फिर ब्राह्मण को चाँदनी, श्वेत नेत्र पट डे साथ दिव्य (सुन्दर) घण्टा, चन्दन, दो वस्र, सरस दधि का दान दे ॥१९०॥ उसके बाद इस ब्रत का उपदेश करने वाले गुरु को भी अच्छी तरह से पूजा करे, उनको वस्र एवं माला तथा चन्दन प्रदान करे । कंजूसी न क२॥१९१॥ जो व्यक्ति इस प्रकार से सारस्वत व्रत करता है, उसको सौभाग्य की प्राप्ति तथा सुन्दर स्वर की प्राप्ति ह्य जाती हैं ॥१९२॥ वह सरस्वती देवी की कृपा से, ब्रह्मालोक में जाकर समादृत होता है । यदि कोई नारी भी इस त्रत को करती है तो वह भी उस व्रत के फल को प्राप्त करती है ॥१९३॥ वह ब्रह्मलोक में तीस कल्पों तक निवास करती है । जो व्यक्ति सारस्वत व्रत को सुनता अथवा पढता है ॥१९४।। वह भी विद्याधरों के लोक में तीस हजार वर्षों तक निवास करता है । इसतरह पद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के बाइसवें ब्रताध्याय अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २२।। i ११, ट्र (३) 4’ |
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